ईशावास्यम् इदं सर्वम्” का अर्थ है कि जो कुछ भी इस संसार में है, वह सब ईश्वर (परम सत्ता) से व्याप्त या आच्छादित है।
यह मंत्र ईशावास्योपनिषद का पहला मंत्र है, जो यह सिखाता है कि इस ब्रह्मांड की हर वस्तु ईश्वर की है, और हमें त्याग की भावना से उसका भोग करना चाहिए, दूसरों के धन की लालसा नहीं करनी चाहिए।
पूरा मंत्र है:
“ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥”
-
ईशावास्यम् इदं सर्वम्:
यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है।
-
यत् किञ्च जगत्यां जगत्:
जो कुछ भी इस संसार में गतिमान और स्थिर है।
-
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:
उससे त्याग के भाव से अपना पालन या भोग करो।
-
मा गृधः कस्यस्विद्धनम्:
किसी के धन की इच्छा मत करो।
इस मंत्र के मुख्य संदेश
-
ईश्वर सर्वव्यापी हैं:कोई भी वस्तु ईश्वर से रहित नहीं है;
सबमें ईश्वर का वास है।
-
त्याग की भावना:
वस्तुओं का भोग करते समय “यह सब मेरा नहीं” का भाव रखना चाहिए।
-
धन की लालसा से बचें:
दूसरों की संपत्ति की कामना करना अनुचित है।
-
आत्म-साक्षात्कार:यह मंत्र आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को परमात्मा के स्वरूप में अनुभव करता है