तत्त्वमसि” एक संस्कृत महावाक्य है जिसका अर्थ है “तू वही है” या “वह तुम ही हो”। अर्थात् में और तुम एक ही है । हम सब एक ही है ।
यह हिन्दू धर्म के छांदोग्य उपनिषद से लिया गया है और अद्वैत वेदांत दर्शन का एक प्रमुख वाक्य है। यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मा) और परम सत्य (ब्रह्म) एक ही हैं, और इस ज्ञान से आत्म-अनुभूति और मुक्ति प्राप्त होती है।
अर्थ और महत्व
‘तत्’ (वह):
परम ब्रह्म या सत्य का प्रतीक है।
‘त्वम्’ (तू/तुम):
जीवात्मा, यानी व्यक्ति के असल स्वरूप का प्रतीक है।
‘असि’ (हो):
‘होने’ या ‘एक ही है’ को दर्शाता है, जो ब्रह्म और आत्मा के संबंध को स्थापित करता है।
मुख्य बिंदु
अद्वैत दर्शन:
‘तत्त्वमसि’ इस अद्वैत (दोहरे न होने) सिद्धांत को बताता है कि सब कुछ एक ही परम सत्य से उत्पन्न हुआ है और उसी में लीन होता है।
ज्ञान का स्रोत:
यह वाक्य व्यक्तिगत अनुभव से परम ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक साधन है, जो शरीर और मन की सीमाओं से परे सत्य को पहचानता है।
जीवन का सार:
इसका अर्थ है कि व्यक्ति का असली स्वरूप कोई नश्वर शरीर या मन नहीं है, बल्कि वह शाश्वत ब्रह्म का अंश है।
उदाहरण:
उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्म विद्या सिखाते समय “तत्त्वमसि श्वेतकेतु” कहा था, जिसका अर्थ है “तू वही है”।
तत्त्वमसि “में और तुम, हम सब एक ही है”