श्री गणेशाय नमः
श्रीवातात्मजय नमः
श्री हनुमते नमः, अंजनीसुताय नमः, वायुपुत्राय नमः, महाबलाय नमः, रामेष्टाय नमः, फाल्गुण सखाये नमः, पिंगाक्षाय नमः, अमितविक्रमाय नमः, उदधि क्रमणे नमः, सीता शोक विनाशने नमः, लक्ष्मण प्राणदात्रे नमः, और दशग्रीव दर्पहा नमः
“मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”
हनुमान जी के मंत्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः बज्रांगबली नमः
रोगों के नाश के लिए
ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।
शत्रु नाश के लिए
ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकायं हुं फट्।
सफलती और तरक्की के लिए
‘ॐ हं हनुमते नम:।’
मनचाहे फल की प्राप्ति के लिए
‘ॐ नमो भगवते हनुमते नम:।’
हनुमान मूल मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं हनुमते श्री रामदूताय नमः॥
रुद्र हनुमान मंत्र
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय।
सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा॥
हनुमान गायत्री मंत्र
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात्॥
पंचमुखी हनुमान मंत्र
ऊं नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा”
हं हनुमंते नम:”
ऊं नमो हनुमते आवेशाय आवेशाय स्वाहा
ऊं हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट स्वाहा !
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा|
हनुमान चालीसा
Hanuman Chalisa
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
बजरंग बाण
Bajarang Baan
दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
चौपाई
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।
जनके काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा।
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर यमकातर तोरा।
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर मह भई।
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होइ दुख करहु निपाता।
जय गिरिधर जय जय सुखसागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर।
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले।
गदा बज्र लै बैरिहि मारो। महारज प्रभु दास उबारो।
ओंकार हुंकार महाबीर धावो। वज्र गदा हनु बिलम्ब न लावो।
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा।
सत्य होहु हरि शपथ पायके। राम दूत धरु मारु जायके।
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दा तुम्हारा।
वन उपवन मग गिरिगृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।
पांय परौं कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता।
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रति पालक।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर, अग्नि बैताल काल मारीमर।
इन्हें मारु तोहिं सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की।
जनक सुता हरिदास कहावो। ताकी सपथ विलंब न लावो।
जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुख नाशा।
चरण-शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।
उठु-उठु चलु तोहिं राम दोहाई। पांय परौं कर जोरि मनाई।
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ओम सं सं सहमि पराने खल दल।
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होत आनंद हमारो।
यहि बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहो फिर कौन उबारे।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करैं प्राण की।
यह बजरंग बाण जो जापै। तेहि ते भूत प्रेत सब कांपै।
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तनु नहिं रहे कलेशा।
दोहा
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज शकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।
संकटमोचन हनुमानाष्टक –
बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारों।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब, छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहां पगु धारो।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाए महा रजनीचर मरो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
.
बान लाग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सूत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दिए तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
रावन जुध अजान कियो तब, नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
बंधू समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो।
जाये सहाए भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
काज किए बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होए हमारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
।। दोहा। ।
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर।।
- संकट नाश के लिए (अचूक):
“दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।” (संकटों से तुरंत मुक्ति पाने के लिए)
- भूत-प्रेत/भय नाश के लिए:
“भूत पिशाच निकट नहीं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।” (नकारात्मक ऊर्जा और डर को दूर करने के लिए)
- रोग नाश के लिए:
“नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।” (स्वास्थ्य और शारीरिक कष्टों को दूर करने के लिए)
- शक्ति और सफलता प्राप्ति के लिए:
“जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीश तिहुं लोक उजागर।।”
- कार्य सिद्ध करने के लिए (बजरंग बाण):
“प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान।।”
- प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥ - “मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”
श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमालामन्त्र
ॐ हनुमन्तमहावीर वायुतुल्यपराक्रमम्।
मम कार्यार्थमागच्छ प्रणमाणि मुहुर्मुहुः
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमालामन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, नानाच्छन्दांसि, श्रीमन्महावीरो हनुमान् देवता, मारुतात्मज इति ह्सौं बीजम्, अञ्जनीसूनुरिति ह्फ्रें शक्तिः, ॐ हाहाहा इत्ति कीलकम्, श्रीरामभक्त इति ह्रां प्राणः, श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर इति ह्रां ह्रीं ह्रूं जीवः, ममाऽरातिपराजयनिमित्त-शत्रुञ्जयस्तोत्र-मालामन्त्र जपे विनियोगः ।
करन्यासः-
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं नमो हनुमते अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं हां हीं हूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्रौं ह स्रूफ्रें ह्सौं रामदूताय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मणप्राणदात्रे मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे अनामिकाभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोक बिनाशनाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः ।
हृदयादिन्यासः –
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं नमो हनुमते हृदयाय नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं रामदूताय शिरसे स्वाहा । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मणप्राणदात्रे शिखायै वषट् । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे कवचाय हुम् । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोकविनाशनाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासाद- भञ्जनाय अस्त्राय फट् । इति हृदयादिन्यासः ।
ध्यानम् –
ध्यायेद् बाल-दिवाकरद्युतिनिभं देवारि-दर्पापहं
देवेन्द्र-प्रमुखैः प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादि-समस्त-वानरयुतं सुव्यक्त-तत्त्वप्रियं
संरक्ताऽरुण-लोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम् ।। १ ।।
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं पपद्ये ॥ २ ॥
वज्राङ्ग पिङ्गकेशाढचं स्वर्ण-कुण्डल-मण्डितम् ।
नियुद्धमुपसङ्कल्प – परावार – पाराक्रमम् ॥ ३ ॥
गदायुक्तं वामहस्तं पाशहस्तं कमण्डलुम् ।
उद्यद्-दक्षिण-दोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ॥ ४ ॥
इति ध्यात्वा, ‘अरे मल्ल चटख’ इत्युच्चारणेऽथवा ‘तोडरमल्ल चटख’ इत्युच्चारणे कपिमुद्रां’ प्रदर्शयेत् ।
।। माला-मन्त्र ।।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्ख्फ्रें ह्सौं नमो हनुमते त्रैलोक्याक्रमण-पराक्रम-श्रीरामभक्त ! मम परस्य च सर्वशत्रून् चतुर्वर्णसम्भवान् पुं-स्त्री-नपुंसकान् भूत- भविष्यद्-वर्तमानान् नानादूरस्थ-समीपस्थान् नाना-नामधेयान् नानासङ्करजातिजान् कलत्र-पुत्र-मित्र भृत्य-बन्धु-सुहृत्-समेतान् प्रभुशक्ति-सहितान् धन-धान्यादि-सम्पत्तियुतान् राज्ञो राजपुत्र- सेवकान् मन्त्रि-सचिव-सखीन् आत्यन्तिकक्षणेन त्वरया एतद्दिनावधि नानोपायैर्मारय मारय शस्त्रेश्छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय अक्षयकुमारवत् पादतलाक्रमणेनाऽनेन शिलातले आत्रोटय आत्रोटय घातय घातय वध वध भूतसङ्घः सह भक्षय भक्षय क्रुद्धचेतसा नखैविंदारय विदारय देशादस्मादुच्चाटय उच्चाटय पिशाचवत् भ्रंशय भ्रंशय भ्रमय भ्रमय भयातुरान् विसंज्ञान् सद्यः कुरु कुरु भस्मीभूतान् उद्धलय उर्दूलय भक्तजनवत्सल ! सीताशोकापहारक ! सर्वत्र माम् एनं च रक्ष रक्ष हाहाहा ह्रुं ह्रुं ह्रुं घे घे घे हुं फट् स्वाहा ॥१॥
ॐ नमो भगवते हनुमते महावलपराक्रमाय महाविपत्ति- निवारकाय भक्तजनमनःकामना-कल्पद्रुमाय दुष्टजन-मनोरथ- स्तम्भनाय प्रभञ्जनप्राणप्रियाय स्वाहा, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः मम शत्रून् शुलेन छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय उच्चाटय उच्चाटय हुं फट स्वाहा ।। २ ।॥
इति माळामन्त्रः ।
लोलल्लाङशत्रुंजयहनुमत्स्तोत्र
सत्रुञ्जय हनुमत्स्तोत्रम्
ध्यानः-
श्रीमन्तं हनुमन्त-मार्तरिपुभिद्-भूभृत्तरुम्राजितं
चाल्यद्-बालधि-वन्धवैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम् ।
अष्टौ रक्त-पिशङ्ग-नेत्र-नलिनं भूभङ्गमङ्ग-स्फुरत्
प्रोद्यच्चण्ड-मयूख-मण्डल-मुखं दुःखापहं दुःखिनाम् ॥१॥
कौपीनं कटिसूत्र-मौञ्ज्यजिनयुगदेहं विदेहात्मजा
प्राणाधीश-पदारविन्दनिरतं स्वान्तं कृतान्तं द्विषाम् ।
ध्यात्वैवं समराङ्गणस्थितमथानीय स्व-हृत्पङ्कजे
सम्पूज्या-ऽखिल-पूजनोक्त-विधिना-सम्प्रार्थयेत् प्रार्थितम् ॥ २॥
।।मूल-पाठ।।
हनुमन्नञ्जनीसूनो ! महाबलपराक्रम ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१।।
मर्कटाधिप ! मार्तण्ड मण्डल-ग्रास-कारक,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२।।
अक्षयन्नपि पिङ्गाक्षक्षितिजाशुग्क्षयङ्र ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।३।।
रुद्रावतार ! संसार-दुःख-भारापहारक,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।४।।
श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायत-मानस ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।५।।
बालिप्रथमक्रान्त सुग्रीवोन्मोचनप्रभो ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।६।।
सीता-विरह-वारीश-मग्न-सीतेशतारक ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।७।।
रक्षोराज-प्रतापाग्नि-दह्यमान-जगधन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।८।।
ग्रस्ताऽशैजगत्-स्वास्थ्य-राक्षसाम्भोधिमन्दर ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।९।।
पुच्छ-गुच्छ-स्फुरद्वीर-जगद्-दग्धारिपत्तन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१०।।
जगन्मनो-दुरुल्लंघ्य-पारावार विलङ्घन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।११।।
स्मृतमात्र-समस्तेष्ट-पूरक ! प्रणत-प्रिय ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१२।।
रात्रिश्वर-चमूराशि-कर्तनैक-विकर्तन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१३।।
जानकी-जानकीज्यानि-प्रेमपात्र ! परन्तप ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१४।।
भीमादिक-महावीर-वीरवेशावतारक ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१५।।
वैदेही-विरह-क्लान्त रामरोषैक-विग्रह ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१६।।
वज्राङग-नख-दंष्ट्रश ! वज्रिवज्रावगुण्ठन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१७।।
अखर्व-गर्व-गंधर्व-पर्वतोद्-भेदन-स्वर ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१८।।
लक्ष्मणप्राण-सन्त्राण त्राता तीक्ष्णकरान्वय ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१९।।
रामाधिविप्रयोगात ! भरताद्यार्तिनाशन ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२०।।
द्रोणाचल-समुत्क्षेप-समुत्क्षिप्तारि-वैभव ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२१।।
सीताशीर्वाद-सम्पन्न ! समस्तावयवाक्षत ,
लोलल्लाङगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२२।।
इत्येवमश्वत्थ-तलोपविष्टः शत्रुञ्जयं नाम पठेत् स्वयं यः ।
स शीघ्रमेवास्त-समस्तशत्रुः प्रमोदते मारुतज-प्रसादात् ॥२३ ॥
।। इति शत्रुञ्जय-हनुमत्स्त्रोतं ।।
विचित्रवीर हनुमते मंत्र
ॐ नमो भगवते विचित्रवीर हनुमते प्रलयकालानलप्रभाज्वलत्प्रताप वज्रदेहाय अञ्जनीगर्भसम्भूताय प्रकटविक्रमवीर दैत्य-दानवयक्षराक्षसग्रहबन्धनाय भूतग्रह प्रेतपिशाचग्रह शाकिनीग्रह डीकिनीग्रह काकिनीग्रह कामिनीग्रह ब्रह्मग्रह ब्रह्मराक्षसग्रह चोरग्रहबन्धनाय एहि एहि आगच्छ आगच्छ आवेशयावेशय मम ह्रदयं प्रवेशय प्रवेशय स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर सत्यं कथय कथय व्याघ्रमुखं बन्धय बन्धय सर्पमुखं बन्धय बन्धय राजमुखं बन्धय बन्धय सभामुखं बन्धय बन्धय शत्रुमुखं बन्धय बन्धय सर्व मुखं बन्धय बन्धय लंकाप्रसादभञ्जन सर्वजनं मे वशमानय वशमानय श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वान आकर्षय आकर्षय शत्रून् मर्दय मर्दय मारय मारय चूर्णय चूर्णय खे खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया मम कार्यसिद्धि कुरू कुरू मम शत्रून् भस्मी कुरू कुरू स्वाहा।
Hanuman Vadvanal Stotra
॥ विनियोग ॥
ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः !
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं !!
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे ॥
सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम् !
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं !!
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये ॥
॥ ध्यान ॥
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं !
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम !
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय ॥
वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र !
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र ॥
अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार !
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद ॥
सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन !
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख निवारणाय ॥
ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन !
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर ॥
चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर !
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस !!
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते !
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ॥
ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं !
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां ॥
शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर !
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय ॥
शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय !
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन !
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु ॥
शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय !
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान् !!
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते !
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र ॥
पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय !
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ॥
एकमुखी हनुमान कवचम
एकदा सुखमासीनं शंकरं लोकशंकरम् |
प्रपच्छ गिरिजा कान्तं कर्पूरधवलं शिवं ||
|| पार्वत्युवाचः ||
भगवान देवदेवेश लोकनाथ जगत्प्रभो,
शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद्भव ||
संग्रामे संकटे घोरे भूत प्रेतादि के भये |
दुःख दावाग्नि संतप्तचेतसाँ दुःखभागिनाम् ||
|| महादेव उवाचः ||
श्रणु देवी प्रवक्ष्यामि लोकानाँ हितकाम्यया |
विभीषणाय रामेण प्रेम्णाँ दत्तं च यत्पुरा ||
कवच कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमतः |
गुह्यं तत्ते प्रवक्ष्यामि विशेषाच्छणु सुन्दरी ||
|| विनियोगः ||
ॐ अस्य श्री हनुमान कवच स्तोत्र मन्त्रस्य श्री रामचंद्र
ऋषिः श्री वीरो हनुमान परमात्माँ देवता, अनुष्टुप छन्दः,
मारुतात्मज इति बीजम, अंजनीसुनुरिति शक्तिः, लक्ष्मण
प्राणदाता इति जीवः,श्रीराम भक्ति रिति कवचम,
लंकाप्रदाहक इति कीलकम मम सकल कार्य सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ||
।। मंत्र ।।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्वौं ह्वं: ।
|| करन्यासः ||
ॐ ह्राँ अंगुष्ठाभ्याँ नमः |
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्याँ नमः |
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याँ नमः |
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्याँ नमः |
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्याँ नमः |
ॐ ह्रंः करतल करपृष्ठाभ्याँ नमः |
।। ह्रदयन्यास ।।
ॐ अंजनी सूतवे नमः हृदयाय नमः
ॐ रुद्रमूर्तये नमः, शिरसे स्वाहा ।
ॐ वतात्मजाय नमः, शिखायं वषटं ।
ॐ रामभक्तिरताय नमः, कवचाय हुम ।
ॐ वज्र कवचाय नमः, नेत्रत्याय वौषट् ।
ॐ ब्राह्मस्त्र निवारणाय नमः, अस्त्राय फट् ।
ॐ धयायेद बालदिवाकर धुतिनिभं देवारिदर्पांपहं ।
देवेन्द्र प्रमुख प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं ऋचा ।।
सुग्रीववादि समस्त वानरयुतं सुव्यत्कतत्वप्रियं ।
संरक्तारूण लोचनं पवनजं पीतांबरालकतम ।।
उधन्मार्तण्ड कोटि प्रकट रुचि युतं चारूबीरासनस्थं ।
मोजीं यज्ञोपवीताभरण रुचि शिखा शोभितं कुण्डलाढयम ।।
भक्तानामिष्टदन्नप्रणतमुंजनं वेदनादप्रमोदं ध्यायेददेवं विधेय प्लवगकुलपतिं गोष्पदीभूतवर्धिम ।
वज्रांँड़् पिंगकेशाढ्यं स्वर्णकुंडल मण्डितम ।
उधदक्षिण दोर्दण्डं हनुमंत विचिन्तये ।।
स्फटिकाभं स्वर्णकांति द्विभुजं च कृताज्जलिम ।
कुण्डलद्वय संशोभि मुखाम्भोजं हरिं भजे ।।
।। हनुमान मंत्र ।।
ॐ नमो भगवते हनुमदाख्य रुद्राय सर्व दुष्ट जन मुख स्तम्भनं कुरु कुरु ॐ ह्रांँ ह्रीं हूंँ ठं ठं ठं फट स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते शोभिताननाय यशोलंकृताय अंजनी गर्भ संभूताय रामलक्ष्मणनंदकाय कपि सैन्य प्रकाशय पर्वतात्पाटनाय सुग्रीववसाह्म करणाय परोच्चाटनाय कुमार ब्रह्मचर्चाय गम्भीर शब्दोदयाय ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रूंँ सर्व दुष्ट ग्रह निवारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते सर्व ग्राहन्भूत भविष्यद्वर्तमान दूरस्थ समीप स्थान छिंधि छिंधि भिंधि भिंधि सर्व काल दुष्ट बुद्धिमुच्चाटयोच्चाटय परबलान क्षोभय क्षोभय मम सर्व कार्याणि साधय साधय ॐ ह्राँ ह्रीं हूंँ फट देहि ॐ शिव सिद्धि ॐ ह्राँ ह्रीं हूंँ स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते पर कृत यंत्र मंत्र पराहङ्कार भूत प्रेत पिशाच पर दृष्टि सर्व तर्जन चेटक विधा सर्व ग्रह भयं निवारय निवारय, वध वध पच पच दल दल विलय विलय सर्वाणिकुयन्त्राणि कुट्टय कुट्टय, ॐ ह्राँ ह्रीं हूंँ फट स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि सर्व ग्रह भूतानाँ शाकिनी डाकिनीनां विषमदुष्टानाँ सर्वेषामा कर्षय कर्षय, मर्दय मर्दय, छेदय – छेदय, मृत्यून मारय मारय, शोषय शोषय, प्रज्वल प्रज्वल, भूत मंडल, पिशाच मंडल, निरसनाय भूत ज्वर, प्रेत ज्वर, चातुर्थिक ज्वर, विष्णु ज्वर, महेश ज्वर, छिन्धि छिन्धि, भिंधि भिंधि, अक्षि शूल, पक्ष शूल, शिरोभ्यंतर शूल, गुल्म शूल, पित्त शूल, ब्रह्म राक्षस कुल पिशाच कुलच्छेदनं कुरु प्रबल नाग कुल ।
विषं निर्विषं कुरु कुरु झटति झटति, ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रूंँ फट घे घे स्वाहा ।
।। श्री राम उवाच ।।
हनुमान पूर्वत: पातु दक्षिणे पवनात्मज: ।
पातु प्रतीच्याँ रक्षोघ्न: पातु सागरपारग: ।। १।।
उदीच्यामूधर्वग: पातु केसरी प्रिय नंदन: ।
अधस्ताद विष्णु भक्तस्तु पातु मध्मं च पावनि: ।। २।।
अवान्तर दिश: पातु सीता शोकविनाशक: ।
लंकाबिदाहक: पातु सर्वापद्भ्यो निरंतरम ।। ३ ।।
सुग्रीव सचिव: पातु मस्तकं वायुनंदन: ।
भालंं पातु महावीरो भ्रुव्रोमध्ये निरंतरम ।। ४ ।।
नेत्रेच्छायापहारी च मातु न: प्लवगेव्श्रेर: ।
कपोले कर्णमूले च पातु श्री राम किंकर: ।।५।।
नासाग्रमज्जनीसुनू पातु वक्त्रं हरीशव्श्रर ।
वाचं रुद्रप्रिय पातु जिव्हा पिंगल लोचन: ।। ६ ।।
पातु दंतान फाल्गुनेष्टाच्श्रिबुकं दैत्यापादहा ।
पातु कंठम च दैत्याचारी: स्कांधौ पातु सूरार्चित : ।। ७ ।।
भुजौ पातु महातेजा: करौ तो चरणायुध: ।
नखान नखायुध: पातु कुक्षिं पातु कपीव्श्रर: ।। ८ ।।
वक्षो मुद्रापहारी च मातु पाशर्वे भुजायुध: ।
लंकाविभज्जन: पातु पृष्ठदेशे निरन्तरम ।।९ ।।
वाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मज: ।
गुह्मं पातु महाप्राज्ञो लिंग पातु शिव प्रिय: ।। १० ।।
ऊरू च जानुनी पातु लंका प्रासाद भज्जन: ।
जंघे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबल: ।। ११।।
अचलोद्वारक: पातु पादौ भास्कर सन्निभ: ।
अड़्न्यमित सत्वाढय: पातु पादाँगुलीस्तथा।।१२ ।।
सर्वांन्डानि महाशूर: पातु रोमाणि चात्मवान ।
हनुमत्कवच यस्तु पठेद विद्वान विचक्षण: ।। १३ ।।
स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं मुक्तिं च विंदति ।
त्रिकालमेककालं वा पठेम्मासत्रयम सदा ।। १४ ।।
सर्वानरिपुनक्षणाजित्वा स पुमानश्रियमात्नुयात ।
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तधारम पठेद यदि ।। १५ ।।
क्षयापस्मार कुष्ठादि ताप ज्वर निवारणम ।
अव्श्रत्थमूलेर्कवारे स्थतवा पठति य पुमान ।। १६ ।।
अचलाँ श्रियमात्नोति संग्रामे विजयं तथा ।
लिखित्वा पूजयेद यस्तू सर्वत्र विजयी भवेत् ।। १७ ।।
य: करे धारयेन्नित्यं सपुमान श्रियमापनुयात ।
विवादे धूतकाले च धूते राजकुले रणे ।। १८ ।।
दशवारं पठेद रात्रौ मिताहारो जितेंद्रिय: ।
विजयं लभेत लोके मानुषेषु नराधिप: ।। १९ ।।
भूत प्रेत महादुर्गे रणे सागर सम्प्लवे ।
सिंह व्याघ्रभये चोग्रे शर शस्त्रास्त्र पातने ।। २० ।।
श्रृंखला बंधने चैव कराग्रह नियंत्रणे ।
कायस्तोभे वह्वि चक्रे क्षेत्रे घोरे सुदारणे ।। २१ ।।
शोके महारण चैव बालग्रहविनाशनम ।
सर्वदा तु पसेन्नित्यं जयमाप्नुत्यसंशयम ।। २२ ।।
भुर्जे व वसने रक्ते क्षीमे व ताल पत्रके ।
त्रिगन्धे नाथ मश्यैव विलिख्य धारयेन्नर: ।। २३ ।।
पञ्च सप्त त्रिलोहैर्वागोपित कवचं शुभम ।
गले कटयाँ बाहुमूल कंठे शिरसि धारितम ।। २४ ।।
सर्वान कामान वापनुयात सत्यं श्रीराम भाषितं ।। २५ ।
श्री पंचमुखहनुमत्कवचमन्त्र
ॐ श्री पंचवदनायांजनेयाय नमः।
ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमत्कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्दः,पंचमुखविराट्हनुमान् देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रौं कीलकं, क्रूं कवचं, क्रैं अस्राय फट् इति दिग्बन्धः ॥
श्री गरुड उवाच:
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वांगसुन्दरि ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम् ॥1॥
पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ॥2॥
पूर्वंतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
दंष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम् ॥3॥
अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् ।
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ॥4॥
पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुंडं महाबलम्॥
सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ॥5॥
उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम् ।
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ॥6॥
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवांतकरं परम ।
येन वक्त्रेण विप्रेंद्र तारकाख्यं महासुरम् ॥7॥
जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम् ।
ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ॥8॥
खंग त्रिशूलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम् ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ॥9॥
भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुंगवम् ।
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ॥10॥
प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम् ।
दिव्यमाल्याम्बरघर दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥11॥
सर्वाश्चर्यमय देव हनुमद्विश्वतोमुखम् ।
पश्चास्यमच्युतम नेकविचित्रवर्णं वक्त्रं
शशांकशिखरं कपिराजवयम ।
पीतांबरादिमुकुटैरूपशोभितांग
पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥12॥
मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् ।
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥13॥
ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुश्चति मुश्चति वामलता ॥14॥
ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गुरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ऊँ नमो भगवते पंचवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशंकराय स्वाहा ।
ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमन्मंत्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः अनुष्टुप्छन्दः, पंचमुखवीरहनुमान् देवता, हनुमानिति बीजम्, वायुपुत्र इति शक्तिः, अंजनीसुत इति कीलकम्, श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । इति ऋष्यादिकं विन्यस्य ।
ॐ अंजनीसुताय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्माभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पंचमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।
ॐ अंजनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वंषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुं ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पंचमुखहनुमते अस्राय फट् ।
पंचमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।
अथ ध्यानम्:
वन्दे वानरनारसिहखगराट्क्रोडाश्ववक्रान्वितं दिव्यालंकरणं त्रिपश्चनयनं दैदीप्यमानं रुचा । हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भांकुशादि हलं खटांगं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम् ॥1॥ इति ॥
अथ मंत्र
ॐ श्रीरामदूतायांजनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्र्रमाय सीतादुःखनिवारणाय लंकादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय फाल्गुनसखाय कोलाहलसकल ब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनिर्लंघनाय पिंगलनयनायामितविक्रमाय सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालंकृताय संजीविनीसंजीवितांगदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागम पंचमुखवीरहनुमन्मंत्रजपे विनियोगः ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पंचमुखवीरहनुमते परयन्त्रपरतंत्रोच्चाटनाय स्वाहा ।
ऊँ कंखंगंघंडं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं ळं क्ष स्वाहा। इति दिग्बंधः ।
ॐ पूर्वकपिमुखाय पंचमुखहनुमते टंटंटंटंटं सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखाय पंचमुखहनुमते करालवदनाय नरसिहाय ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ऊँ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पंचमुखहनुमते मंमंमंमंमं सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये पंचमुखहनुमतये स्वाहा ।
ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।
ऊँ अंजनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय श्रीरामचंद्रकृपापादुकाय
महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय कामदाय पंचमुखवीरहनुमते स्वाहा ।
भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह परयंत्रपरतंत्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पंचमुखवीरहनुमते श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवच पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ॥15॥
द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पतकरं शुभम् ॥16॥
चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम् ।
पंचवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशंकरम् ॥17॥
षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशंकरम् ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥18॥
अष्टवारं पठेन्नित्यं मिष्टकामार्थसिद्धिदम् ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्युनात् ॥19॥
दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम् ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥20॥
कवचस्मतरणेनैव महाबलमवाप्नुयात् ॥21॥
॥ सुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं श्री पंचमुख हनुमान स्त्रोतम सम्पूर्णं !!
पंचमुख हनुमान माला मंत्र
ओं ह्रौं क्ष्रौं ग्लौं हुं ह्सौं ओं नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते प्रकट पराक्रमाक्रान्त
सकलदिङ्मण्डलाय, निजकीर्ति स्फूर्तिधावल्य वितानायमान जगत्त्रितयाय,
अतुलबलैश्वर्य रुद्रावताराय, मैरावण मदवारण गर्व निर्वापणोत्कण्ठ कण्ठीरवाय,
ब्रह्मास्त्रगर्व सर्वङ्कषाय, वज्रशरीराय, लङ्कालङ्कारहारिणे, तृणीकृतार्णवलङ्घनाय,
अक्षशिक्षण विचक्षणाय, दशग्रीव गर्वपर्वतोत्पाटनाय, लक्ष्मण प्राणदायिने,
सीतामनोल्लासकराय, राममानस चकोरामृतकराय, मणिकुण्डलमण्डित गण्डस्थलाय,
मन्दहासोज्ज्वलन्मुखारविन्दाय, मौञ्जी कौपीन विराजत्कटितटाय, कनकयज्ञोपवीताय,
दुर्वार वारकीलित लम्बशिखाय,
तटित्कोटि समुज्ज्वल पीताम्बरा लङ्कृताय,
तप्त जाम्बुनप्रभाभासुर रम्य दिव्यमङ्गल विग्रहाय, मणिमयग्रैवेयाङ्गद हारकिङ्किणी
किरीटोदारमूर्तये, रक्तपङ्केरुहाक्षाय, त्रिपञ्चनयन स्फुरत्पञ्चवक्त्र खट्वाङ्ग त्रिशूल
खङ्गोग्र पाशाङ्कुश क्ष्माधर भूरुह कौमोदकी कपाल हलभृद्दशभुजाटोपप्रताप भूषणाय,
वानर नृसिंह ताक्ष्य वराह हयग्रीवानन धराय, निरङ्कुश वाग्वैभवप्रदाय,
तत्त्वज्ञानदायिने, सर्वोत्कृष्ट फलप्रदाय, सुकुमार ब्रह्मचारिणे, भरत प्राणसंरक्षणाय,
गंभीरशब्दशालिने, सर्वपापविनाशाय, राम सुग्रीव सन्धान चातुर्य प्रभावाय,
सुग्रीवाह्लादकारिणे, वालि विनाशकारणाय, रुद्रतेजस्विने वायुनन्दनाय,
अञ्जनागर्भरत्नाकरामृतकराय,
निरन्तर रामचन्द्रपादारविन्द मकरन्द मत्त
मधुरकरायमाण मानसाय, निजवाल वालयीकृत कपिसैन्य प्राकाराय, सकल
जगन्मोदकोत्कृष्टकार्य निर्वाहकाय,
केसरीनन्दनाय, कपिकुञ्जराय, भविष्यब्रह्मणे, ओं
नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते तेजोराशे एह्येहि देवभयं असुरभयं गंधर्वभयं यक्षभयं
ब्रह्मराक्षसभयं भूतभयं प्रेतभयं पिशाचभयं विद्रावय विद्रावय, राजभयं चोरभयं
शत्रुभयं सर्पभयं वृश्चिकभयं मृगभयं पक्षिभयं क्रिमिभयं कीटकभयं खादय खादय,
ओं नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते जगदाश्चर्यकर शौर्यशालिने एह्येहि श्रवणजभूतानां
द्दष्टिजभूतानां शाकिनी ढाकिनी कामिनी मोहिनीनां भेताल ब्रह्मराक्षस सकल
कुष्माण्डानां विषयदुष्टानां विषमविशेषजानां भयं हर हर मथ मथ भेदय भेदय छेदय
छेदय मारय मारय शोषय शोषय प्रहारय प्रहारय,
ठठठठ खखखख खेखे ओं नमो
भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते शृङ्खलाबन्ध विमोचनाय उमामहेश्वर तेजो महिमावतार
सर्वविषभेदन सर्वभयोत्पाटन सर्वज्वरच्छेदन सर्वभयभञ्जन, ओं नमो भगवते
पञ्चवक्त्र हनूमते कबलीकृतार्कमण्डल भूतमण्डल प्रेतमण्डल पिशाचमण्डलान्निर्घाटय
निर्घाटाय भूतज्वर प्रेतज्वर पिशाचज्वर माहेश्वरज्वर भेतालज्वर ब्रह्मराक्षसज्वर
एकाहिकज्वर द्व्याहिकज्वर त्र्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर पञ्चरात्रिकज्वर विषमज्वर
दोषज्वर ब्रह्मराक्षसज्वर भेतालपाश महानागकुलविषं निर्विषं कुरु कुरु झट झट
दह दह, ओं नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते कालरुद्र रौद्रावतार
सर्वग्रहानुच्चाटयोच्चाटय आह आह एहि एहि दशदिशो बन्ध बन्ध सर्वतो रक्ष रक्ष
सर्वशत्रून् कम्पय कम्पय मारय मारय दाहय दाहय कबलय कबलय
सर्वजनानावेशय आवेशय मोहय मोहय आकर्षय आकर्षय,
ओं नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते जगद्गीतकीर्तये प्रत्यर्थिदर्प दलनाय परमन्त्रदर्प दलनाय
परमन्त्रप्राणनाशाय आत्ममन्त्र परिरक्षणाय परबलं खादय खादय क्षोभय क्षोभय
हारय हारय त्वद्भक्त मनोरथानि पूरय पूरय सकलसञ्जीविनीनायक वरं मे दापय
दापय,
ओं नमो भगवते पञ्चवक्त्र हनूमते ओं ह्रौं क्ष्रौं ग्लौं हुं ह्सौं श्रीं भ्रीं घ्रीं ओं न्रूं
क्लीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः हुं फट् खे खे हुं फट् स्वाहा |
एकादशमुखि हनुमत्कवचम्
ॐ नमो हनुमते एकादश वक्त्राय रुद्राय, भूत-प्रेत-पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-नाशकाय, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट् स्वाहा”
एकादशमुखि हनुमत्कवचम्
(रुद्रयामलतः)
श्रीदेव्युवाच
शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च ।
कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ 1॥
श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च ।
किंचिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ 2॥
ईश्वर उवाच
शऋणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ।
हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ 3॥
एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् ।
जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ 4॥
ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमालामंत्रस्य
वीररामचंद्र ऋषिः । अनुष्टुप्छंदः । श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता ।
ह्रीं बीजम् । ह्रौं शक्तिः । स्फें कीलकम् ।
सर्वदूतस्तंभनार्थं जिह्वाकीलनार्थं,
मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं
ब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीभूतप्रेतादिबाधापरिहारार्थं
श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामंत्रजपे विनियोगः ।
अथ करन्यासः ।
ॐ ह्रौं आंजनेयाय अंगुष्ठभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें अंजनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
अथ अंगन्यासः ।
ॐ ह्रौं आंजनेयाय हृदयाय नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ ह्रौं अंजनीगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् ।
इति न्यासः ।
अथ ध्यानम् ।
ॐ ध्यायेद्रणे हनुमंतमेकादशमुखांबुजम् ।
ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनं
हाहाकारैः सदर्पैश्च कंपयंतं जगत्त्रयम् ।
ब्रह्मादिवंदितं देवं कपिकोटिसमन्वितं
एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥
दिग्बंधाः
ॐ इंद्रदिग्भागे गजारूढहनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ अग्निदिग्भागे मेषारुढहनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ यमदिग्भागे महिषारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ निऋर्तिदिग्भागे नरारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वरुणदिग्भागे मकरारूढहनुमते प्राणशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वायुदिग्भागे मृगारूढहनुमते अंकुशशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ कुबेरदिग्भागे अश्वारूढहनुमते गदाशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ ईशानदिग्भागे राक्षसारूढहनुमते पर्वतशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ अंतरिक्षदिग्भागे वर्तुलहनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वज्रमंडले हंसारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
मालामंत्रः ।
ॐ ह्रीं यीं यं प्रचंडपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते
हंसयतिबंध-मतिबंध-वाग्बंध-भैरुंडबंध-भूतबंध-
प्रेतबंध-पिशाचबंध-ज्वरबंध-शूलबंध-
सर्वदेवताबंध-रागबंध-मुखबंध-राजसभाबंध-
घोरवीरप्रतापरौद्रभीषणहनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय
वज्रकुंडलकौपीनतुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय
ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय
चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ 1 ॥
ॐ वीरहनुमते नमः ।
ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीतांबरधराय कर्णकुंडलाद्या-
भरणालंकृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय
कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय
श्रीवीररामचंद्रमनोभिलषिताय लंकादिदहनकारणाय
घनकुलगिरिवज्रदंडाय अक्षकुमारसंहारकारणाय
ॐ यं ॐ नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥
ॐ ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय
अंजनीगर्भसंभूताय शाकिनीडाकिनीविध्वंसनाय किलिकिलिचुचु कारेण
विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौ ह्रां फट् स्वाहा ॥
ॐ श्रीवीरहनुमते हौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रैं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते
लं सकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते
रं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते
मं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नैऋर्तिमुखे वराहमुखहनुमते
क्षं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते
वं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते
यं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते
सं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं
आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते
आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते
ह्रीं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते
स्फ्रूं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय
ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय
भानुमंडलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय
महाभयरक्षकाय यं हौम् ।
ॐ हस्फें हस्फें हस्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन्
मां रक्ष रक्ष शांतिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु
महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु
महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु
महालक्ष्मीं देहि हुं फट् स्वाहा ॥
फलश्रुतिः
इत्येतत्कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् ।
यः पठेत्प्रयतो भूत्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः ।
रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥
मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि ।
क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥
यः पठेत्कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः ।
त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥
देवमभ्यर्च्य विधिवत्पुरश्चर्यां समारभेत् ।
एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥
यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् ।
ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥
गद्यपद्यमया वाणी तस्य वक्त्रे प्रजायते ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥
एकादशमुखिहनुमत्कवचं सम्पूर्णं ॥
क्षमा प्रार्थना
आबाहनं न जानामि नैव जानामि पूजनम् ।विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।।1।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।यत्पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे ।।2।।
यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।तत्सव क्षम्यतो देव प्रसीद परमेश्वर ।।3।।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्योवन्दे तमच्युतम् ।।4।।
प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषुयत् ।स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णः स्यादिति श्रुतिः ।।5।।
साष्टांग नमस्कार
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ।।
नमो ब्रह्मणयदेवाय गौब्राह्मणहिताय च ।जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् ।देवकी परमानन्दं कृष्णं बन्दे जगद्गुरुम् ।।
शुभ कामना
स्वस्ति प्रजाभ्य परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः ।गोब्राह्मणेभ्यो शुभमस्तु नित्यं, लोकासमता सुखिनोभवन्तु ।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात् ।।2।।
अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः ।निर्धनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ।।3।।
श्रद्धां मेधा यशः प्रज्ञां विद्यां पुष्टि श्रियं बलम् ।तेज आयुष्यमारोग्यं देहि मे हव्यवाहन ।।4।।
शांति पाठ
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्ति रापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु ।।
धर्म की जय हो: सदाचारी और सत्य के मार्ग की विजय हो।
अधर्म का नाश हो: बुराई, अन्याय और अनैतिकता का अंत हो।
प्राणियों में सद्भावना हो: सभी जीवों के प्रति प्रेम, करुणा और भाईचारा हो।
विश्व का कल्याण हो: मानवता और पूरे संसार का भला हो।