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श्री त्रिपुरसुंदरी षोडशी श्रीविद्या

श्री त्रिपुरसुंदरी षोडशी श्रीविद्या

माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी मंत्र

माँ की पूजा तीन स्वरूपों में होती है :

1. बाल सुंदरी- 8 वर्षीया कन्या रूप में

2. षोडशी त्रिपुर सुंदरी – 16 वर्षीया सुंदरी

3. ललिता त्रिपुर सुंदरी- युवा स्वरूप

मुख्य नाम : महा त्रिपुरसुंदरी।

अन्य नाम : श्री विद्या, त्रिपुरा, श्री सुंदरी, राजराजेश्वरी, ललित, षोडशी, कामेश्वरी, मीनाक्षी।
भैरव : कामेश्वर।

तिथि : मार्गशीर्ष पूर्णिमा।

भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान परशुराम।

कुल : श्री कुल ( इन्हीं के नाम से संबंधित )।

दिशा : नैऋत्य कोण।

स्वभाव : सौम्य।

सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : कामाख्या मंदिर, ५१ शक्ति पीठों में सर्वश्रेष्ठ, योनि पीठ गुवहाटी, आसाम।

कार्य : सम्पूर्ण या सभी प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने वाली।
सर्वप्रथम त्रिपुरा सुंदरी साधना के लिये मंत्र सिद्ध त्रिपुरा सुंदरी यंत्र व माला ले लें.
नहा धोकर कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें,  मंत्र सिद्ध यंत्र लेकर गंगा जल मिश्रित जल से स्नान करवा कर पोंछ कर साफ प्लेट में रक्खें यंत्र पर तीन बिंदी लगाये व धुप दीपक जला कर मीठा  अर्पित करें.

शारीरिक वर्ण : उगते हुए सूर्य के समान।

माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी  आवाहन यंत्र पर मन्त्र बोलते हुऐ करें :

“ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।“

मंत्र सिद्ध त्रिपुरा माला से निम्नलिखित किसी भी मंत्र का जाप करें :-

माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी मंत्र :

“ऊं ह्रीं कं ऐ ई ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं स क ह ल ह्रीं।”

माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी महामंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः।

ध्यान:-
बालार्क युत तैजसं त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लसिनीं।
नानालंकृतिराजमानवपुषं बालोडुराट शेखराम्।।

हस्तैरिक्षु धनुः सृणि सुमशरं पाशं मुदा विभ्रतीं।
श्री चक्र स्थितःसुन्दरीं त्रिजगतधारभूतां भजे।।

षोडशी त्रिपुर सुंदरी मंत्र-

“ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं। “

. त्रिपुर सुंदरी या ललिता माता का मंत्र- दो मंत्र है। रूद्राक्ष माला से दस माला जप कर सकते हैं।

1.  ‘ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:’
2. ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।’

ऊं श्रीं ऊं या ऊं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

की पांच मालाएं करें। यह जप कमलगट्टे की माला की माला से त्रिपुरा सुंदरी के यंत्र के सामने करें । पहले पांच दिन पांच मालाएं करें। इसके बाद आप एक माला भी कर सकते हैं। शुक्रवार विशेष मंगलकारी है।
फल प्राप्ति: देवी त्रिपुर सुंदरी की पूजा से श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है। साहस आता है। आत्मिक बल मिलता है।  यश और कीर्ति प्राप्त होती है। इहलोक और परलोक सुधरता है। बौद्धिक विकास होता है।
भोग: त्रिपुर सुंदरी को अनार का भोग लगाना चाहिए।
माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी बीज मंत्र

ऐं  ह्रीं  श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।’

ॐ – श्रीं – ह्रीं – क्लीं – ऐं – सौः

(ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः)
चपं चेक्षुमायं प्रसूनविशिखं पशांकुशं पुस्तकं
माणिक्यशसृजवरं मनिमयीं विणं सुरोजद्वयम् |
पाणिभ्यं वरदा अभयं च दधातिं ब्रह्मादिसेव्यं परं
सिन्दूरारुण विग्रहं भगवतीं तम शोषोदाशिमाश्रये ||

चापं चेक्षुमायं प्रसूनविशेषं पाशाङ्कुशं पुस्तकं
माणिक्यशसृज्वरं मणिमयीं वीणां सुरोजद्वयं।
पाणिभ्यां वरदा अभयं च दधातिं ब्रह्मादिसेव्यं परं
सिन्दूरारुण विग्रहं भगवतीं तां षोडशीमाश्रये॥
श्री बीज रखें, फिर माया बीज रखें, फिर काम बीज रखें, फिर वाग्भाव बीज रखें और अंत में परा बीज रखें। इस प्रकार इस मंत्र की पहली पंक्ति बनती है।

ऐ ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:। ‘

1. ॐ – श्रीं – ह्रीं – क्लीं – ऐं – सौः: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ( 5 बीज-एस , ॐ छोड़ा गया)

2. ॐ – ह्रीं – श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ( 3 बीज-एस )

3. का – ई – आई – ला- ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ( 5 बीज-एस )

4. हा – सा – का – हा – ला – ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ( 6 बीज-स)

5. सा – का – ला – ह्रीं स क ल ह्रीं ( 4 बीज-स )

6. सौः – ऐं – क्लीं – ह्रीं – श्रीं सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ( 5 बीज-एस )
प्रथम भाग – सात बार पढ़ा जाना चाहिए:

ई ए क ल ह्रीं इ ई का ला ह्रीं
ह स क ह ल ह्रीं ह सा का हा ला ह्रीं
स क ल ह्रीं सा का ला ह्रीं

दूसरा भाग – तीन बार पढ़ा जाना चाहिए:

ह स क ह स क ह ल ह्रीं ह सा का हा सा का हा ला ह्रीं
स क ल ह्रीं सा का ला ह्रीं
ई ए क ल ह्रीं इ ई का ला ह्रीं

तीसरा भाग – एक बार पढ़ना चाहिए।

ह ल भ भ भ भ अ हा ला भा भा भा भा भा ए

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः — ॐ श्रीं
ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं श्रीं — ॐ ह्रीं श्रीं
का ई ला ह्रीं — क ए ई ल ह्रीं
ह सा का हा ला ह्रीं — ह स क ह ल ह्रीं
सा का ला ह्रीं — स क ल ह्रीं
सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं — सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं

 

“ॐ ह्रीं भै

“ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:”

रवी कलौं ह्रीं स्वाहा:”

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