Jagrayam Foundation

शिव

शिव
शिव ही प्रकृति हे,
प्रकृति ही शिव है ,
शिव ही लय प्रलय हे,
शिव आदि सृजन और अनंत हे,
शिव रूद्र महादेव महेश हे,
शिव अमरनाथ केदारेश्वर विश्वनाथ सोमनाथ हे,
केलाश मैकाल और ओंकार भी शिव हे,
शिव ही कालो का भी काल,
महाकाल है भगवान शिव !

वन्दे देव उमापतिम सुरगुरुं वन्दे जगत् कारणं,
वन्दे पन्नग भूषणं मृग्धरम वन्दे पशूनाम्पतिम !
वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनम वन्दे मुकुंदप्रियम,
वन्दे भक्त जनाश्रयम च वरदम वन्दे शिवम् शंकरं !!

शिव अर्थात शुभ और कल्याणकारी , तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु अर्थात हमारा मन शुभ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो कि प्रार्थना शास्त्र करता हे,

भवानि शङ्करौ वन्दे श्रध्दा विश्वास रूपिणौ |
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् ||

‘भवानीशंकरौ वंदे’
भवानी और शंकर की हम वंदना करते है।

‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ अर्थात श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का शंकर। श्रद्धा और विश्वास- का प्रतीक विग्रह मूर्ति हम मंदिरों में स्थापित करते हैं। इनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाते,जल चढ़ाते, बेलपत्र चढ़ाते, आरती करते है।

‘याभ्यांबिना न पश्यन्ति’ श्रद्धा और विश्वास के बिना कोई सिद्धपुरुष भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते।

तत पुरुषाय विध्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात ।

शिव लिंग
यह सारा विश्व ही भगवान है। शंकर की गोल पिंडी बताता है कि वह विश्व- ब्रह्माण्ड गोल है, एटम गोल है, धरती माता, विश्व माता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं। शिव का आकार लिंग स्वरूप माना जाता है। उसका सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है। ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौंदर्य का कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। मनुष्य को आत्मा की उपासना करनी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।

1.शिव का वाहन वृषभ / बैल “नंदी”

शिव का वाहन वृषभ शक्ति का पुंज भी है सौम्य- सात्त्विक बैल शक्ति का प्रतीक है, हिम्मत का प्रतीक है।
आकाशे तारका लिंगम ,
पाताले हात्केश्वारह मृत्युरर्लोके महाकाले ,
लिंगम त्रियम नमोस्तुते !

2.चंद्र – शांति, संतुलन –

चंद्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है,चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है, शंकर भक्त का मन सदैव चंद्रमा की भाँति प्रफुल्ल और उसी के समान खिला निःशंक होता है।

3.माँ गंगा की जलधारा –

सिर से गंगा की जलधारा बहने से आशय ज्ञानगंगा से है|गंगा जी यहाँ ‘ज्ञान की प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं।महान आध्यात्मिक शक्ति को संभालने के लिए शिवत्व ही उपयुक्त है |
माँ गंगा उसकी ही जटाओं में आश्रय लेती हैं | मस्तिष्क के अंतराल में मात्र ‘ग्रे मैटर’ न भरा रहे, ज्ञान- विज्ञान का भंडार भी भरा रहना चाहिए, ताकि अपनी समस्याओं का समाधान हो एवं दूसरों को भी उलझन से उबारें। वातावरण को सुख- शांतिमय कर दें।अज्ञान से भरे लोगों को जीवनदान मिल सके| |
शिव जैसा संकल्प शक्ति वाला महापुरुष ही उसे धारण कर सकता है| महान बौद्धिक क्रांतियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाए हुए हों।वही ब्रह्मज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

4.तीसरा नेत्र

-ज्ञानचक्षु , दूरदर्शी विवेकशीलता . जिससे कामदेव जलकर भस्म हो गया। | यह तृतीय नेत्र स्रष्टा ने प्रत्येक मनुष्य को दिया है। सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जाग्रत रहता है पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि काम वासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है।

कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम !
सदा वसंतम हृदया रविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि !!!

5. गले में नाग

-शंकर भगवान ने गले में पड़े हुए काले विषधरों नाग का इस्तेमाल इस तरीके से किया है कि, उनके लिए वे फायदेमन्द हो गए, उपयोगी हो गए और काटने भी नहीं पाए।

6. नीलकंठ – मध्यवर्ती नीति अपनाना-

शिव ने उस हलाहल विष को अपने गले में धारण कर लिया, न उगला और न पीया। उगलते तो वातावरण में विषाक्तता फैलती, पीने पर पेट में कोलाहल मचता।शिक्षा यह है कि विषाक्तता को न तो आत्मसात् करें, न ही विक्षोभ उत्पन्न कर उसे उगलें। उसे कंठ तक ही प्रतिबंधित रखे। मध्यवर्ती नीति ही अपने जाये योगी पुरुष पर संसार के अपमान, कटुता आदि दुःख- कष्टों का कोई प्रभाव नहीं होता।
उन्हें वह साधारण घटनाएँ मानकर आत्मसात् कर लेता है और विश्व कल्याण की अपनी आत्मिक वृत्ति निश्चल भाव से बनाए रहता है। खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है। यही योगसिद्धि है।

7. मुण्डों की माला

-जीवन की अंतिम परिणति और सौगात
राजा व रंक समानता से इस शरीर को छोड़ते हैं।वे सभी एकसूत्र में पिरो दिए जाते हैं। यही समत्व योग है । जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं, सजाते संवारते हैं , वह मुंडों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है।
जिस बाहरी रंग के टुकड़ों को हम देखते हैं, उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है।

मृत्युंजय महाकाल त्राहिमाम शरणागतः ,
जन्म मृत्यु जरा व्याधि पीड़ितो कर्म बंधनाह !!

8. डमरु –

शिव डमरू बजाते और मौज आने पर नृत्य भी करते हैं। यह प्रलयंकर की मस्ती का प्रतीक है। व्यक्ति उदास, निराश और खिन्न, विपन्न बैठकर अपनी उपलब्ध शक्तियों को न खोए, पुलकित- प्रफुल्लित जीवन जिए। शिव यही करते हैं, इसी नीति को अपनाते हैं। उनका डमरू ज्ञान, कला, साहित्य और विजय का प्रतीक है।
यह पुकार- पुकारकर कहता है कि शिव कल्याण के देवता हैं। उनके हर शब्द में सत्यम्, शिवम् की ही ध्वनि निकलती है। डमरू से निकलने वाली सात्त्विकता की ध्वनि सभी को मंत्रमुग्ध सा कर देती है और जो भी उनके समीप आता है अपना सा बना लेती है।

9. त्रिशूल धारण –

ज्ञान, कर्म और भक्ति
लोभ, मोह, अहंता के तीनों भवबंधन को ही नष्ट करने वाला ,साथ ही हर क्षेत्र में औचित्य की स्थापना कर सकने वाला एक एसा अस्त्र – त्रिशूल. यह शस्त्र त्रिशूल रूप में धारण किया गया- ज्ञान, कर्म और भक्ति की पैनी धाराओं का है।

10. बाघम्बर –

वे बाघ का चर्म धारण करते है। जीवन में बाघ जैसे ही साहस और पौरुष की आवश्यकता है जिसमें अनर्थों और अनिष्टों से जूझा जा सके |

11. शरीर पर भस्म –

प्ररिवर्तन से अप्रभावित
शिव बिखरी भस्म को शरीर पर मल लेते हैं, ताकि ऋतु प्रभावों का असर न पड़े। मृत्यु को जो भी जीवन के साथ गुँथा हुआ देखता है उस पर न आक्रोश के आतप का आक्रमण होता है और न भीरुता के शीत का ।
वह निर्विकल्प निर्भय बना रहता है।

12. मरघट में वास –

उन्हें श्मशानवासी कहा जाता है। वे प्रकृतिक्रम के साथ गुँथकर पतझड़ के पीले पत्तों को गिराते तथा बसंत के पल्लव और फूल खिलाते रहते हैं। मरण भयावह नहीं है और न उसमें अशुचिता है। गंदगी जो सड़न से फैलती है। काया की विधिवत् अंत्येष्टि कर दी गई तो सड़न का प्रश्न ही नहीं रहा।
हर व्यक्ति को मरण के रूप में शिवसत्ता का ज्ञान बना रहे, इसलिए उन्होंने अपना डेरा श्मशान में डाला है।

अवन्तिकायाम विहिव्तारम
मुक्ति प्रदायनाय च सज्जनाम,
अकाल मृत्युर परिरक्शनाय,
वन्दे महाकाल महा सुरेश्वरम !!

13. हिमालय में वास

जीवन की कष्ट कठिनाइयों से जूझ कर शिवतत्व सफलताओं की ऊँचाइयों को प्राप्त करता है | जीवन संघर्षों से भरा हुआ है | जैसे हिमालय में खूंखार जानवर का भय होता है वैसा ही संघर्षमयी जीवन है |
शिव भक्त उनसे घबराता नहीं है उन्हें उपयोगी बनाते हुए हिमालय रूपी ऊँचाइयों को प्राप्त करता है |

14. शिव –

गृहस्थ योगी – गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिव जी के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना है। सांसारिक व्यवस्था को चलाते हुए भी वे योगी रहते हैं, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृ- शक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है।
ऋद्धि- सिद्धियाँ उनके पास रहने में गर्व अनुभव करती हैं। यहाँ उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्मकल्याण की साधना असंभव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते- खेलते पूरा किया जा सकता है।

15. शिव – पशुपतिनाथ

शिव को पशुपति कहा गया है। पशुत्व की परिधि में आने वाली दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का नियन्त्रण करना पशुपति का काम है। नर- पशु के रूप में रह रहा जीव जब कल्याणकर्त्ता शिव की शरण में आता है तो सहज ही पशुता का निराकरण हो जाता है और क्रमश: मनुष्यत्व और देवत्व विकसित होने लगता है।

16. शिव के गण –

शिव के लिए समर्पित व्यक्तित्व

”तनु क्षीनकोउ अति पीन पावन कोउ अपावन तनु धरे।” – रामायण

शंकर जी ने भूत- पलीतों का, पिछड़ों का भी ध्यान रखा है और अपनी बरात में ले गए। शिव के गण भूत- पलीत जैसों का है। पिछड़ों, अपंगों, विक्षिप्तों को हमेशा साथ लेकर चलने से ही सेवा- सहयोग का प्रयोजन बनता है।
शंकर जी के भक्त अगर हम सबको साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर हमें सोचने में मुश्किल पड़ेगी, समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और फिर जिस आनंद में और खुशहाली में शंकर के भक्त रहते हैं हम रह नहीं पाएँगे।

17. शिव के प्रधान गण – वीरभद्र-

वीरता अभद्र-अशिष्ट न हो,भद्रता – शालीनता डरपोक न हो, तभी शिवत्व की स्थापना होगी |

18. शिव परिवार – एक आदर्श परिवार

शिवजी के परिवार में सभी अपने अपने व्यक्तित्व के धनी तथा स्वतंत्र रूप से उपयोगी हैं | अर्धांगनी माँ भवानी ज्येष्ठ पुत्र देव सेनापति कार्तिकेय तथा कनिष्ठ पुत्र प्रथम पूज्य गणपति हैं | सभी विभिन्न होते हुए भी एक साथ हैं | बैल -सिंह , सर्प -मोर प्रकृति में दुश्मन दिखाई देते हैं किन्तु शिवत्व के परिवार में ये एक दुसरे के साथ हैं |
शिव के भक्त को शिव परिवार जैसा श्रेष्ठ संस्कार युक्त परिवार निर्माण के लिए तत्पर होना चाहिए |

19. शिव को अर्पण-प्रसाद –

भांग-भंग अर्थात विच्छेद- विनाश। माया और जीव की एकता का भंग, अज्ञान आवरण का भंग, संकीर्ण स्वार्थपरता का भंग, कषाय- कल्मषों का भंग। यही है शिव का रुचिकर आहार। जहाँ शिव की कृपा होगी वहाँ अंधकार की निशा भंग हो रही होगी और कल्याणकारक अरुणोदय वह पुण्य दर्शन मिल रहा होगा।

बेलपत्र- बेलपत्र को जल के साथ पीसकर छानकर पीने से बहुत दिनों तक मनुष्य बिना अन्न के जीवित रह सकता है | शरीर भली भांति स्थिर रह सकता है |
शरीर की इन्द्रियां एवं चंचल मन की वृतियां एकाग्र होती हैं तथा गूढ़ तत्व विचार शक्ति जाग्रत होती है |अतः शिवतत्व की प्राप्ति हेतु बेलपत्र स्वीकार किया जाता है |

20. शिव-मंत्र
“ ॐ नमः शिवाय

“शिव’ माने कल्याण। कल्याण की दृष्टि रखकर के हमको कदम उठाने चाहिए और हर क्रिया- कलाप एवं सोचने के तरीके का निर्माण करना चाहिए- यह शिव शब्द का अर्थ होता है। सुख हमारा कहाँ है? यह नहीं, वरन कल्याण हमारा कहाँ है? कल्याण को देखने की अगर हमारी दृष्टि पैदा हो जाए तो यह कह सकते हैं कि हमने भगवान शिव के नाम का अर्थ जान लिया। इसी भाव को बार बार याद करने की क्रिया है मन्त्र ।

21. शिव- “ महामृत्युंजय मंत्र “

महामृत्युञ्जय मंत्र में शिव को त्र्यंबक और सुगंधि पुष्टि वर्धनम् गाया है। विवेक दान भक्ति को त्रिवर्ग कहते हैं। ज्ञान, कर्म और भक्ति भी त्र्यंबक है। इस त्रिवर्ग को अपनाकर मनुष्य का व्यक्तित्व प्रत्येक दृष्टि से परिपुष्ट व परिपक्व होता है। उसकी समर्थता और संपन्नता बढ़ती है। साथ ही श्रद्धा, सम्मान भरा सहयोग उपलब्ध करने वाली यशस्वी उपलब्धियाँ भी करतलगत होती हैं। यही सुगंध है।
गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता का प्रतिफल यश और बल के रूप में प्राप्त होता है। इसमंन तनिक भी संदेह नहीं। इसी रहस्य का उद्घाटन महामृत्युञ्जय मंत्र में विस्तारपूर्वक किया गया है। फ़िर वह खर्बुजे की तरह मृत्यु बन्धन, मृत्यु के भय से मुक्त हो मोक्ष के अमरत्व को प्राप्त करता है |

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम
उर्वारुकमिव वन्दनार्थ मृत्तुर्मुक्षीय मामृतात !!

22. महाशिवरात्रि –

रात्रि नित्य- प्रलय और दिन नित्य- सृष्टि है। एक से अनेक की ओर कारण से कार्य की ओर जाना ही सृष्टि है |इसके विपरीत अनेक से एक और कार्य से कारण की ओर जाना प्रलय है। दिन में हमारा मन, प्राण और इंद्रियाँ हमारे भीतर से बाहर निकल बाहरी प्रपंच की ओर दौड़ती हैं |
रात्रि में फिर बाहर से भीतर की ओर वापस आकर शिव की ओर प्रवृत्ति होती है। इसी से दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय की द्योतक है। समस्त भूतों का अस्तित्व मिटाकर परमात्मा से अल्प- समाधान की साधना ही शिव की साधना है।
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आत्मानंद प्रदान करने वाली है और जिसका शिव से विशेष संबंध है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में यह विशेषता सर्वाधिक पाई जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उस दिन चंद्रमा सूर्य के निकट होता है।
इस कारण उसी समय जीव रूपी चंद्रमा का परमात्मा रूपी सूर्य के साथ भी योग होता है। अतएव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को की गई साधना से जीवात्मा का शीघ्र विकास होता है।

23. शिव उपासना –

मनन और उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पथ पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं, जो अपने मन में स्वार्थ भावना को त्यागकर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं |

शिव ही प्रकृति हे,
प्रकृति ही शिव
वह ही लय प्रलय हे,
वही आदि सृजन और अनंत हे,
वह रूद्र महादेव महेश हे,
वह ही कालो का भी काल महाकाल हे,
अमरनाथ केदारेश्वर विश्वनाथ सोमनाथ हे,
केलाश मैकाल और ओंकार भी वही हे,
वही पवित्र शिव हे.

ॐ नमः शिवाय

शिव स्तुति

शिवं शान्तं शाश्वतमप्रमेयम्,
निर्मलं निर्विकल्पं निराकृतिम्।
निर्गुणं निर्विकारं निराभासं,
नमामि शम्भुं निरानन्द रूपम्॥

शिव ध्यान मंत्र व अर्थ
ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारूचंद्रां वतंसा
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।।
पद्मासीनं समंतात् स्तुततममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं।
विश्वाद्यं विश्वबद्यं निखिलभय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।

सरल शब्दों में मतलब है कि पञ्चमुखी, त्रिनेत्रधारी, चांदी की तरह तेजोमयी, चंद्र को सिर पर धारण करने वाले, जिनके अंग-अंग रत्न-आभूषणों से दमक रहे हैं, चार हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा है। मुखमण्डल पर आनंद प्रकट होता है, पद्मासन पर विराजित हैं, सारे देव, जिनकी वंदना करते हैं, बाघ की खाल धारण करने वाले ऐसे सृष्टि के मूल, रचनाकार महेश्वर का मैं ध्यान करता हूं।

शैव धर्म और सनातन हिंदू परंपरा में मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करना एक पवित्र और भावपूर्ण प्रक्रिया है।

भगवान शिव की शिक्षाओं और प्रथाओं पर आधारित यह चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका इस प्रकार है:

1.

पवित्रता और निष्ठा:

शुद्ध हृदय और सच्ची प्रार्थना के साथ शिव के पास जाएँ। भगवान शिव को आशुतोष (सरलता से प्रसन्न होने वाले) के रूप में जाना जाता है और वे विस्तृत अनुष्ठानों की अपेक्षा भक्ति को महत्व देते हैं।

2.

स्वयं को शुद्ध करें:

प्रार्थना शुरू करने से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।

3.
पवित्र स्थान बनाएँ:


यदि संभव हो, तो शिव मंदिर जाएँ या घर पर शिवलिंग या चित्र के साथ एक छोटा सा वेदी बनाएँ।

4.

आहुति (उपचार)
:

सामान्य आहुति में शामिल हैं:

शिवलिंग पर जल या दूध (अभिषेकम)

बेल के पत्ते, जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं

सफेद फूल, फल और अगरबत्ती

5.

मंत्र जाप:

श्रद्धापूर्वक शिव मंत्रों का जाप करें।

मनोकामना पूर्ति के लिए  शक्तिशाली मंत्र:

“ॐ नमः शिवाय”

 

शिव का सबसे पवित्र सार्वभौम मंत्र 

जय श्री महाकाल

आकाशे तारका लिंगम ,
पाताले हात्केश्वारह
मृत्युरर्लोके महाकाले ,
लिंगम त्रियम नमोस्तुते !!

अवन्तिकायाम विहिव्तारम
मुक्ति प्रदायनाय च सज्जनाम,
अकाल मृत्यु परिरक्शनाय,
वन्दे महाकाल महा सुरेश्वरम !!

मृत्युंजय महाकाल
त्राहिमाम शरणागतः ,
जन्म मृत्यु जरा व्याधि
पीड़ितो कर्म बंधनाह !!

ॐ हौं जूं स: ॐ भुर्भव: स्व: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ भुव: भू: स्व: ॐ स: जूं हौं ॐ !!

तत पुरुषाय विध्महे
महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् !!

 

ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च
नमः शंकराय च मयस्कराय च
नमः शिवाय च शिवतराय च !!

जो सर्व कल्याणकारी हैं ,
उन्हें प्रणाम !
जो सभी को सर्वोत्तम सुख देनेवाले हैं ,
उन्हें प्रणाम !
जो सभी का मंगल करने वाले हैं,
उन्हें प्रणाम !

वन्दे देव उमापतिम सुरगुरुं
वन्दे जगत् कारणं,
वन्दे पन्नग भूषणं मृग्धरम
वन्दे पशूनाम्पतिम !
वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनम
वन्दे मुकुंदप्रियम,
वन्दे भक्त जनाश्रयम च वरदम
वन्दे शिवम् शंकरं !!

कर्पूरगौरम करुणावतारम
संसारसारं भुजगेंद्रहारम !
सदा वसंतम हृदया रविन्दे
भवम भवानी सहितं नमामि !!

श्री शिवाय नमस्तुभ्यम  :

Shri Shivay Namastubhyam :

अर्थ : “हे शुभ (शिव), मैं आपको नमस्कार करता हूँ”। यह भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है, जो शिव महापुराण से लिया गया है, और इसका जाप सुख, शांति, समृद्धि और सभी कष्टों के निवारण के लिए किया जाता है।

ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः  :

‘ॐ’ को प्रणव मंत्र या ब्रह्मनाद कहा जाता है।

‘साम्ब’ का अर्थ है ‘सह अम्बा’ अर्थात ‘माँ के साथ’। यहाँ ‘अम्बा’ का तात्पर्य माँ पार्वती से है। अतः ‘साम्ब’ का अर्थ है भगवान शिव जो माँ पार्वती के साथ हैं। ‘सदाशिव’ का अर्थ है ‘सदा शिव’, अर्थात ‘हमेशा कल्याणकारी’। नमः का अर्थ है “नमन” या “प्रणाम”। यह भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।

शिव तंत्रोक्त मन्त्र 

।।

ह्रीं ॐ हौं शं नमो भगवते सदाशिवाय ।।

शिव धन प्राप्ति मंत्र

दारिद्र्य दहन स्तोत्र का अंश

आर्थिक प्रगति,  धन के आगमन के लिए इस मंत्र का जाप श्रेष्ठ है:

“ॐ ह्रीं नमः शिवाय।” या
“दरिद्रदुःखदहनाय नमः शिवाय।”

 

शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम:शिवाय॥1॥

 

मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय।

मण्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम:शिवाय॥2॥

 

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।

श्रीनीलकण्ठाय बृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम:शिवाय॥3॥

 

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।

चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम:शिवाय॥4॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम:शिवाय॥5॥

पञ्चाक्षरिमदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥6॥

 

नमस्ते
अस्तु भगवान विश्वेश्वराय महादेवाय
त्रयंबकाय त्रियंबकाय
कालाग्निरुद्राय
नीलकंठाय मृत्युंजय सर्वेश्रवराय सदाशिवाय

श्रीमन् महादेवाय नमः !!


 

 

श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं


विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।

हे ईशान! मैं मुक्तिस्वरूप, समर्थ, सर्वव्यापक, ब्रह्म, वेदस्वरूप, निज स्वरूप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, अनन्त ज्ञानमय और आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त प्रभु को प्रणाम करता हूं।।1।।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं

गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।

करालं महाकाल कालं कृपालं

गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।
जो निराकार हैं, ओंकाररूप आदिकारण हैं, तुरीय हैं, वाणी, बुद्धि और इन्द्रियों के पथ से परे हैं, कैलासनाथ हैं, विकराल और महाकाल के भी काल, कृपाल, गुणों के आगार और संसार से तारने वाले हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूं ।।2।।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं

मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।3।।
जो हिमालय के समान श्वेतवर्ण, गम्भीर और करोड़ों कामदेवों के समान कान्तिमान शरीर वाले हैं, जिनके मस्तक पर मनोहर गंगाजी लहरा रही हैं, भाल देश में बाल-चन्द्रमा सुशोभित होते हैं और गले में सर्पों की माला शोभा देती है।।3।।

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं

प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, जिनके नेत्र एवं भृकुटि सुन्दर और विशाल हैं, जिनका मुख प्रसन्न और कण्ठ नील है, जो बड़े ही दयालु हैं, जो बाघ के चर्म का वस्त्र और मुण्डों की माला पहनते हैं, उन सर्वाधीश्वर प्रियतम शिव का मैं भजन करता हूं।।4।।
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।
जो प्रचण्ड, सर्वश्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर, पूर्ण, अजन्मा, कोटि सूर्य के समान प्रकाशमान, त्रिभुवन के शूलनाशक और हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले हैं, उन भावगम्य भवानीपति का मैं भजन करता हूं।।5।।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।
हे प्रभो! आप कलारहित, कल्याणकारी और कल्प का अंत करने वाले हैं। आप सर्वदा सत्पुरुषों को आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरासुर का नाश किया था, आप मोहनाशक और ज्ञानानन्दघन परमेश्वर हैं, कामदेव के शत्रु हैं, आप मुझ पर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।।6।।
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।
मनुष्य जब तक उमाकान्त महादेव जी के चरणारविन्दों का भजन नहीं करते, उन्हें इहलोक या परलोक में कभी सुख तथा शान्ति की प्राप्ति नहीं होती और न उनका सन्ताप ही दूर होता है। हे समस्त भूतों के निवास स्थान भगवान शिव! आप मुझ पर प्रसन्न हों।।7।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।8।।
हे प्रभो! हे शम्भो! हे ईश! मैं योग, जप और पूजा कुछ भी नहीं जानता, हे शम्भो! मैं सदा-सर्वदा आपको नमस्कार करता हूं। जरा, जन्म और दुःख समूह से सन्तप्त होते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए।।8।।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।
जो मनुष्य भगवान शंकर की तुष्टि के लिए ब्राह्मण द्वारा कहे हुए इस रुद्राष्टक का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उन पर शंकरजी प्रसन्न होते हैं।।9।।
।।
इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरुद्राष्टकम् सम्पूर्ण हुआ।।
 
ॐ नमो भगवते रुद्राय ॐ ऐं महास्वस्त्यै नमः ॥
अर्थ: ‘यह शक्तिशाली मंत्र रुद्र (शिव) को समर्पित है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने और इच्छाओं को पूरा करने के लिए इसका पाठ किया जाता है।

Rudra Mantra


ॐ नमो भगवते रूद्राय ।

Om Namo Bhagwate Rudraay |

 


शिव तांडव स्तोत्र

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

॥ इति रावण रचित शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

Shiv Dhyan Mantra


करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधं ।


विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥


Karcharankritam Vaa Kaayjam Karmjam Vaa Shravannayanjam Vaa Maansam Vaa Paradham |


Vihitam Vihitam Vaa Sarv Metat Kshamasva Jay Jay Karunaabdhe Shree Mahadev Shambho ||


“मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकन्ताय शंभवे


अमृतेषाय सर्वाय महादेवाय ते नमः”

ध्यान
ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,
रत्नाकलोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नं।
पद्माशीनं समन्तात स्तुरिममरगणेव्यार्घृतिं वसानं,
विश्ववाध्यं विश्ववन्द्यम निखिल भहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥
स्वच्छ स्वर्णपयोदं भतिकजपावर्णेभिर्मुखे: पंचभि:,
त्र्यक्षरैचितिमीशमिन्दुमुकुटं सोमेश्वराख्यं प्रभुम।
शूलैटंक कृपाणवज्रदहनान-नागेन्द्रघंटाकुशान,
पाशं भीतिहरं उधानममिताकल्पोज्ज्वलांग भेजे॥


करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवणन्यांजं वा मसंवापराधं।


विहितं विहितं वा सर्व मेत् क्षमस्व जय जय करुणाबद्ध श्री महादेव शम्भो ॥


कर्चरणकृतं वा कायजं कर्मजं वा श्रवणन्यांजं वा मांससं वा पराधम |


विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमास्व जय जय करुणाअबधे श्री महादेव शम्भो ||


अर्थ

 –
शरीर, मन और आत्मा को सभी तनाव, अस्वीकृति, विफलता, अवसाद और अन्य नकारात्मक शक्तियों से शुद्ध करने के लिए ईश्वर की स्तुति।


शिव स्तुति मंत्र 
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।1।
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।2।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।3।
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।4।
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।5।
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।6।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।7।
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।8।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।9।
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।10।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।11।

श्रीमहादेव ध्यान मंत्र ( रावण द्वारा रचित)

ॐ डिं डिं डिंकत डिम्ब डिम्ब डमरु, पाणी सदा यस्य वै फुं फुं फुंकत सर्पजाल हृदयं, धं धं च घण्टा रवम् ॥
वं वं वंकत वम्ब वम्ब वहनं, कारुण्य पुण्यात् परम् ॥
भं भं भकत भम्ब भम्ब नयनं, ध्यायेत् शिवं शंकरम् ॥
यावत् तोय धरा धरा धर धरा, धारा धरा भूधरा ।।
यावत् चारू सुचारू चारू चमरं, चामीकरं चामरं ।
यावत् रावण राम राम रमणं, रामायणे श्रूयताम् ।
तावत् भोग विभोग भोगमतुलम् यो गायते नित्यसः ॥
यस्याग्रे द्राट द्राट द्रुट द्रुट ममलं टंट टंट टटटम् ।
तैलं तैलं तु तैलं खुखु खुखु खुखुमं, खंख खंख सखखम् ॥
डंस डंस डुडंस डुहि चकितं, भूपकं भूय नालम् ।।
ध्यायस्ते विप्रगाहे सवसति सवलः पातु वः चंद्रचूडः ॥
गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितम् ।।
खट्वांग च सितं सितश्च भृषभः, कर्णेसिते कुण्डले ।।
गंगाफनेसिता जटापशुपतेश्चनद्रः सितो मुर्धनी ॥
सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं, पापक्षयं सर्वदा ॥

 


शिव मानस पूजा
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं।
नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥
जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा।
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1॥
सौवर्णे नवरत्न खंडरचिते पात्र धृतं पायसं।
भक्ष्मं पंचविधं पयोदधि युतं रम्भाफलं पानकम्‌॥
शाका नाम युतं जलं रुचिकरं कर्पूर खंडौज्ज्वलं।

ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥2॥
छत्रं चामर योर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निमलं।
वीणा भेरि मृदंग काहलकला गीतं च नृत्यं तथा॥
साष्टांग प्रणतिः स्तुति-र्बहुविधा ह्येतत्समस्तं ममा।
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥3॥
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्‌॥4॥
कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्‌।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥5॥

शिव मानस पूजा का भावार्थ :- 
मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूं कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइए। हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूं। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है। केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूं। जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है। सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूं, आप ग्रहण कीजिए।
मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पांच प्रकार के स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदलीफल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल एवं ताम्बूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।
हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चंवर और पंखा झल रहा हूँ। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभि आदि की मधुर ध्वनियां आपको प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं। स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूं। प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।
हे शंकरजी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वतीजी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं। मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है। मैं जो सोता हूं, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त जिन-जिन कर्मों को करता हूं, वह आपकी आराधना ही है।
हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं। वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए। हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।
ऐसी सुंदर भावनात्मक स्तुति द्वारा हम मानसिक शांति के साथ-साथ ईश्वर की कृपा बिना किसी साधन संपन्न कर सकते हैं। मानसिक पूजा का शास्त्रों में श्रेष्ठतम पूजा के रूप में वर्णित है। इस शिव मानस पूजा कृपा का दिव्य साक्षात्‌ प्रसाद मनुष्य को निरंतर ग्रहण करते रहने की आवश्यकता है।


शिवमहिम्न स्तोत्रम्


पुष्पदंत उवाच** महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी। स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः॥ अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन्। ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥1॥

अर्थ: 
श्री पुष्पदंत जी कहते हैं कि हे प्रभु ! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाए तो मैं तो एक साधारण बालक हूं, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें॥


अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो:। रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।। स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः। पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥2॥


अर्थ:
 
हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन और न ही वचन द्वारा संभव है। आपके संदर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा ‘नेति नेति’ का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्य भाव का परिणाम है॥


मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत:। स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम्।। मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः। पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥3॥

अर्थ: 
हे वेद और भाषा के सृजन ! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अर्थात ज्ञान के अनुसार आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी ||


तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत्।
त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम्।
विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥4॥

अर्थ:
 हे देव ! आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार अर्थात संहार करने वाले हैं। इस प्रकार आपके ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन स्वरूप हैं। तथा आप में सत्व, रज और तम तीन गुण भी हैं । वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। ऐसा करने से भले ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुंह नहीं मोड़ सकते ॥


किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम्।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च॥
अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः।
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥5॥

अर्थ: 
हे महादेव ! मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े हैं और मेरी सीमित शक्ति से उसे व्यक्त करना असंभव है॥


अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां।
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो।
यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥6॥

अर्थ: 
हे परमपिता! यह सात लोक आपके द्वारा ही बनाया गया है, इसके कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री दूसरे के पास होना असंभव है। इसलिए अज्ञानी लोग ही आपके विषय में संदेह करते हैं॥


त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति।
प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां।
नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥7॥

अर्थ: 
हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है ॥


महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः।
कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम्।
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। 8।।

अर्थ: 
हे शिव ! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता॥


ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम्।
परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव।
स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।।9।।

अर्थ: 
हे त्रिपुरहंता ! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं।।


तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः।
परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः॥
ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्।
स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।।10।।

अर्थ:
 हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों क्या ऐसा कभी हो सकता है भला ।।


अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम्।
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्॥
शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः।
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥11॥

अर्थ:
 हे त्रिपुरान्तक ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ़ भक्ति का नतीजा है॥


अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम्।
बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगु ष्ठशिरसि।
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।।12।।

अर्थ: 
हे शिव ! आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा मगर इससे उसने क्या करना चाहा ? आपकी पूजा के लिए हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए कैलाश को उठाकर लंका में गाड़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण ने अपनी भुजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा लगाया तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहां भी उसे स्थान नहीं मिला। सचमुच, जब कोई आदमी अनधिकृत बल या संपत्ति का स्वामी बन जाता है तो उसका उपयोग करने में विवेक खो देता है।।


यदृद्धि सुत्राम्णो वरद!
परमोच्चैरपि सती। मधश्चक्र बाणः परिजनविधैयस्त्रिभुवनः॥
नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः।
न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥13॥

अर्थ: 
हे शम्भो ! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनों लोकों पर राज किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धा भक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।।


अकाण्ड: ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा।
विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संह तवतः ।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभगंव्यसनिनः ॥14॥

अर्थ:
 हे प्रभु ! जब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरूप बनाता है? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।।


असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्।
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। 15।।

अर्थ: 
हे प्रभु ! कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव हो। पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया। यह जगत प्रसिद्ध है कि श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।।


मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम्।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्॥
मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा।
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥ 16॥

अर्थ: 
हे नटराज !!! जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है, आपके पद प्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्ग लोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैकुंठ में खलबली मच जाती है। हे महादेव ! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है॥


वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते॥
जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः।।17।।

अर्थ: 
हे शिव! गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके सिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पड़ता है। बाद में जब गंगा जी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े-बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है।।


रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा।
रथांगेचन्द्राकौं रथचरणपाणिः शर इति॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः।
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।।18।।

अर्थ: 
हे शिव! आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंस करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णु जी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहद प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता? आपने तो केवल (अपने नियंत्रण में रही) शक्तियों के साथ खेल किया था, लीला की थी।।


हरिस्ते साहस्त्र कमलबलिमाधाय पदयो।
र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहर कमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा।।
त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥19॥

अर्थ: 
हे शिव! जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों (एवं सहस्त्र नामों) द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से विष्णु जी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी ऐसी अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनो लोक (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) की रक्षा के लिए सदैव जागृत रहते हो।।


क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् ।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् ।
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥20॥

अर्थ: 
हे शिव! यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया कोई कर्म फलदायी नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फल दाता मानकर हर कोई अपने कार्यों का शुभारंभ करते है॥


क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां।
सृवीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः।।
क्रतुन षस्त्वत्तः क्रतुफल विधानव्यसनिनो।
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः॥ 21॥

अर्थ: 
हे प्रभु ! यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तद्यपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेरित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है इसलिए दक्ष प्रजापति के महायज्ञ यज्ञ को जिसमें स्वयं ब्रह्मा तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए, आपने नष्ट कर दिया क्योंकि उसमें आपका सम्मान नहीं किया गया। सचमुच, भक्ति के बिना किये गये यज्ञ किसी भी यज्ञकर्ता के लिए हानिकारक सिद्ध होते है ।।


प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्त्वां दुहितरम्।
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।।
धनुः पाणेर्यातं दिवमपि सपत्नाकृतममुम्।
त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥22॥

अर्थ:
 हे शिव! काल से प्रेरित मृग रूप धारण किये ब्रह्मा को भय से मृगी रूप धारण करने वाली अपनी कन्या में आसक्त देख, आपका उनके पीछे छोड़ा गया बाण आर्द्रा आज भी नक्षत्र रूप में मृगशिरा (ब्रह्मा) के पीछे वर्तमान है।


स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह वाय तृणवत्।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वापुरमथन पुष्पायुधमपि॥
यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्ध-घटनाद्।
अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः॥23॥

अर्थ: 
हे शिव! हे त्रिपुरा नाशक ! जब कामदेव ने आपकी तपश्चर्या में बाधा डालनी चाही और आपके मन में पार्वती के प्रति मोह उत्पन्न करने की कोशिश की, तब आपने कामदेव को तृणवत् भस्म कर दिया। अगर तत्पश्चात् भी पार्वती ये समझती है कि आप उन पर मुग्ध है क्योंकि आपके शरीर का आधा हिस्सा उनका है, तो ये उनका भ्रम होगा। सच पूछो तो हर युवती अपनी सुंदरता पर मुग्ध होती है।।


श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः।
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्।
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। 24।।

अर्थ:
 हे भोलेनाथ !!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भूत – प्रेत आपके मित्र हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाला धारण करते हैं। ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी ! उन भक्तों जो आपका स्मरण करते है, आप सदैव शुभ और मंगल करते है।।


मनः प्रत्यविचत्त सविधमवधायात्तमरुतः।
प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिल्लोत्संगितदृशः।।
यदालोक्याह लावं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये।
यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥25॥

अर्थ: 
हे शिव! जिस प्रकार अमृतमय सरोवर में अवगाहन से (स्नान करने से) प्राणिमात्र तापत्रय से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों से पृथक करके मन को स्थिर कर विधिपूर्वक प्राणायाम से पुलकित तथा आनन्दाश्र से युक्त योगीजन ज्ञान दृष्टि से जिसे देखकर परमानंद का अनुभव करते हैं, वह आप ही हैं ।।


त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वंहुतवह।
स्त्वमापरत्वं व्योमत्वमुधरणिरात्मा त्वमिति च ॥
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता ब्रिभ्रतिगिरम्।
न विद्मस्तत्तत्वंवयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥26॥

अर्थ: 
हे शिव! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव ! मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों ।।


त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रि भुवनमथोत्रीनपिसुरां।
नकाराद्यं र्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः।।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः।
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥27॥

अर्थ: 
हे शिव! ॐ शब्द अ, ऊ, म से बना है। ये तीन शब्द तीन लोक – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल; तीनों देव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा तीन अवस्था – स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति के द्योतक है। लेकिन जब पूरी तरह से ॐ कार का ध्वनि निकलता है तो ये आपके तुरीय पद (तीनों से पर) को अभिव्यक्त करता है॥


भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां स्तथा।
भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ॥
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि। प्रियायास्मैधाम्नेप्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥28॥

अर्थ:
 हे शिव! हे शिव ! वेद एवं देवगण आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र , पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे शम्भू! मैं भी आपकी इन नामों की भावपूर्वक स्तुति करता हूं॥


नमोनेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः॥
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो।
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥29॥

अर्थ: 
हे एकांतप्रिय प्रभु ! आप सब से दूर हैं फिर भी सब के पास है। हे कामदेव को भस्म करने वाले प्रभु ! आप अति सूक्ष्म है फिर भी विराट है। हे तीन नेत्रों वाले प्रभु ! आप वृद्ध है और युवा भी है। हे महादेव ! आप सब में है फिर भी सब से पर है। आपको मेरा प्रणाम है।।


बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः ।
प्रबलतम से तत्संहारे हराय नमो नमः ॥
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौमृडाय नमो नमः ।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥30॥

अर्थ: 
हे प्रभु ! मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपके ब्रह्म स्वरूप को नमन करता हूं। तमोगुण को धारण करके आप जगत का संहार करते हो, आपके उस रुद्र स्वरूप को मैं नमन करता हूं। सत्वगुण धारण करके आप लोगों के सुख के लिए कार्य करते हो, आपके उस विष्णु स्वरूप को नमस्कार है। इन तीनों गुणों से पर आपका त्रिगुणातीत स्वरूप है, आपके उस शिव स्वरूप को मेरा नमस्कार है।।


कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्वं क्व चेदम् ।
क्व च तव गुणसीमोल्लङ् घिनीशश्ववृद्धिः।।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्।
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥31॥

अर्थ:
 हे वरदाता (शिव) ! मेरा मन शोक, मोह और दुःख से संतप्त तथा क्लेश से भरा पड़ा है। मैं दुविधा में हूं कि ऐसे भ्रमित मन से मैं आपके दिव्य और अपरंपार महिमा का गान कैसे कर पाउंगा ? फिर भी आपके प्रति मेरे मन में जो भाव और भक्ति है उसे अभिव्यक्त किये बिना मैं नहीं रह सकता। अतः ये स्तुति की माला आपके चरणों में अर्पित करता हूं॥


असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे ।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥32॥

अर्थ:
 हे शिव! यदि समुद्र को दवात बनाया जाए, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड़ की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है॥


असुरसुरमुनीन्द्रं रचितस्येन्दुमौले।
ग्रंथित गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो।।
रुचिरमलघुवृत्तेः स्तोत्रमेतच्चकार ॥33॥

अर्थ: 
हे प्रभु ! आप सुर, असुर और मुनियों के पूजनीय है, आपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है, और आप सभी गुणों से परे है। आपकी इसी दिव्य महिमा से प्रभावित होकर मैं, पुष्पदंत गंधर्व, आपकी स्तुति करता हूं।।


अहरहरनवद्य धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्।
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्य:।।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र।
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥34॥

अर्थ:
 पवित्र और भक्ति भावपूर्ण हृदय से जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, तो वो पृथ्वीलोक में अपनी इच्छा के अनुसार धन, पुत्र, आयुष्य और कीर्ति को प्राप्त करेगा। इतना ही नहीं, देहत्याग के पश्चात् वो शिवलोक में गति पाकर शिवतुल्य शांति का अनुभव करेगा। शिवमहिम्न स्तोत्र के पठन से उसकी सभी लौकिक व पारलौकिक कामनाएँ पूर्ण होंगी ॥


महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥35॥

अर्थ: 
शिव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं है, भगवान शंकर के नाम से अधिक महिमावान कोई मंत्र नहीं है और ना ही गुरु से बढ़कर कोई पूजनीय तत्व ॥


दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 36॥

अर्थ: 
शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करने से जो फल मिलता है वो दीक्षा या दान देने से, तप करने से, तीर्थाटन करने से, शास्त्रों का ज्ञान पाने से तथा यज्ञ करने से कहीं अधिक है।।


कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः।
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः।।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्।
स्तवनमिदमकार्षीवृदिव्यदिव्यं महिम्नः ॥37॥

अर्थ: 
सभी गंधर्वों के राजा पुष्पदंत भाल में चंद्रमा को धारण करने वाले देवाधिदेव महादेव जी के दास थे। वे सुरगुरु महादेव जी के क्रोध से अपनी महिमा से भ्रष्ट हुए, तब उन्होंने शिवजी की प्रसन्नता के लिए इस परम दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र को बनाया ॥


सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्।
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेतः।।
ग्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः।
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥38॥

अर्थ: 
जो मनुष्य अपने दोनों हाथों को जोड़कर, भक्ति भावपूर्ण, इस स्तोत्र का पठन करेगा, तो वह स्वर्ग-मुक्ति देने वाले, देवता और मुनियों के पूज्य तथा किन्नरों के प्रिय ऐसे भगवान शंकर के पास अवश्य जायेगा। पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फल देने वाला है ॥


आसमाप्त मिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्व मीश्वर वर्णनम् ॥39॥

अर्थ: 
पुष्पदंत गंधर्व द्वारा रचित, भगवान शिव के गुणानुवाद से भरा, मनमोहक, अनुपम और पुण्य प्रदायक स्तोत्र यहाँ पर संपूर्ण होता है ।।


इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥40॥

अर्थ: 
हे प्रभु ! वाणी के माध्यम से की गई मेरी यह पूजा आपके चरण कमलों में सादर अर्पित है। कृपया इसका स्वीकार करें और आपकी प्रसन्नता मुझ पर बनाए रखें ।।


तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥41॥

अर्थ: हे शिव ! हे महेश्वर ! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता। लेकिन आप जैसे भी है, जो भी है, मैं आपको प्रणाम करता हूं ।।


एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥42॥

अर्थ: 
जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वह सर्व प्रकार के पाप से मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है ।।


श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन।
स्तोत्रेण किल्विष-हरेण हर-प्रियेण ।।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन।
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥43॥

अर्थ: 
पुष्पदंत के मुख पंकज से उदित, पाप का नाश करने वाले, भगवान शंकर की अति प्रिय यह स्तुति का जो पठन करेगा, गान करेगा या उसे सिर्फ अपने स्थान में रखेगा, तो भोलेनाथ शिव उन पर अवश्य प्रसन्न होंगे ।।

।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम् ।।

शिवमहिम्न स्तोत्र भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। जो भी इस स्तोत्र का पूरे विधि-विधान से पाठ करता है, वह इस मृत्युलोक में धन, वैभव और यश को प्राप्त करता है और मृत्यु के बाद शिवलोक जाता है।

शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ बहुत ही लाभदायक बताया गया है। कहते हैं, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत श्री रामकृष्ण इस स्तोत्र का पाठ करते हुए समाधि में चले गए थे। शिवमहिम्न स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं।

पाशुपतास्त्र स्तोत्र


ॐ श्लीं पशुं हुं फट् स्वाहा।

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे।
ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट।
हूंकारास्त्राय फट।
वज्र हस्ताय फट।
शक्तये फट।
दण्डाय फट।
यमाय फट।
खडगाय फट।
नैऋताय फट।
वरुणाय फट।
वज्राय फट।
पाशाय फट।
ध्वजाय फट।
अंकुशाय फट।
गदायै फट।
कुबेराय फट।
त्रिशूलाय फट।
मुदगराय फट।
चक्राय फट।
पद्माय फट।
नागास्त्राय फट।
ईशानाय फट।
खेटकास्त्राय फट।
मुण्डाय फट।
मुण्डास्त्राय फट।
काड्कालास्त्राय फट।
पिच्छिकास्त्राय फट।
क्षुरिकास्त्राय फट।
ब्रह्मास्त्राय फट।
शक्त्यस्त्राय फट।
गणास्त्राय फट।
सिद्धास्त्राय फट।
पिलिपिच्छास्त्राय फट।
गंधर्वास्त्राय फट।
पूर्वास्त्रायै फट।
दक्षिणास्त्राय फट।
वामास्त्राय फट।
पश्चिमास्त्राय फट।
मंत्रास्त्राय फट।
शाकिन्यास्त्राय फट।
योगिन्यस्त्राय फट।
दण्डास्त्राय फट।
महादण्डास्त्राय फट।
नमोअस्त्राय फट।
शिवास्त्राय फट।
ईशानास्त्राय फट।
पुरुषास्त्राय फट।
अघोरास्त्राय फट।
सद्योजातास्त्राय फट।
हृदयास्त्राय फट।
महास्त्राय फट।
गरुडास्त्राय फट।
राक्षसास्त्राय फट।
दानवास्त्राय फट।
क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट।
त्वष्ट्रास्त्राय फट।
सर्वास्त्राय फट।
नः फट। वः फट। पः फट। फः फट। मः फट। श्रीः फट। पेः फट। भूः फट। भुवः फट। स्वः फट। महः फट। जनः फट। तपः फट। सत्यं फट। सर्वलोक फट। सर्वपाताल फट। सर्वतत्व फट। सर्वप्राण फट। सर्वनाड़ी फट। सर्वकारण फट। सर्वदेव फट। ह्रीं फट। श्रीं फट। डूं फट। स्त्रुं फट। स्वां फट। लां फट। वैराग्याय फट। मायास्त्राय फट। कामास्त्राय फट। क्षेत्रपालास्त्राय फट। हुंकरास्त्राय फट। भास्करास्त्राय फट। चंद्रास्त्राय फट। विघ्नेश्वरास्त्राय फट। गौः गां फट। स्त्रों स्त्रौं फट। हौं हों फट। भ्रामय भ्रामय फट। संतापय संतापय फट। छादय छादय फट। उन्मूलय उन्मूलय फट। त्रासय त्रासय फट। संजीवय संजीवय फट। विद्रावय विद्रावय फट। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट।

शिव स्तुति

आशुतोष शशाँक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा ॥
निर्विकार ओमकार अविनाशी,
तुम्ही देवाधि देव,
जगत सर्जक प्रलय करता,
शिवम सत्यम सुंदरा ॥
निरंकार स्वरूप कालेश्वर,
महा योगीश्वरा,
दयानिधि दानिश्वर जय,
जटाधार अभयंकरा ॥
शूल पानी त्रिशूल धारी,
औगड़ी बाघम्बरी,
जय महेश त्रिलोचनाय,
विश्वनाथ विशम्भरा ॥
नाथ नागेश्वर हरो हर,
पाप साप अभिशाप तम,
महादेव महान भोले,
सदा शिव शिव संकरा ॥
जगत पति अनुरकती भक्ति,
सदैव तेरे चरण हो,
क्षमा हो अपराध सब,
जय जयति जगदीश्वरा ॥
जनम जीवन जगत का,
संताप ताप मिटे सभी,
ओम नमः शिवाय मन,
जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥
आशुतोष शशाँक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा ॥
कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..

श्री शिव सहस्त्रनाम / Shiv Sahastranaam

ॐ स्थिराय नमः।
ॐ स्थाणवे नमः।
ॐ प्रभवे नमः।
ॐ भीमाय नमः।
ॐ प्रवराय नमः ।
ॐ वरदाय नमः ।
ॐ वराय नमः ।
ॐ सर्वात्मने नमः ।
ॐ सर्वविख्याताय नमः ।
ॐ सर्वस्मै नमः ॥ १० ॥

ॐ सर्वकराय नमः ।
ॐ भवाय नमः ।
ॐ जटिने नमः ।
ॐ चर्मिणे नमः ।
ॐ शिखण्डिने नमः ।
ॐ सर्वाङ्गाय नमः ।
ॐ सर्वभावनाय नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ हरिणाक्षाय नमः ।
ॐ सर्वभूतहराय नमः ॥ २० ॥

ॐ प्रभवे नमः ।
ॐ प्रवृत्तये नमः ।
ॐ निवृत्तये नमः ।
ॐ नियताय नमः ।
ॐ शाश्वताय नमः ।
ॐ ध्रुवाय नमः ।
ॐ श्मशानवासिने नमः ।
ॐ भगवते नमः ।
ॐ खचराय नमः ।
ॐ गोचराय नमः ॥ ३० ॥

ॐ अर्दनाय नमः ।
ॐ अभिवाद्याय नमः ।
ॐ महाकर्मणे नमः ।
ॐ तपस्विने नमः ।
ॐ भूतभावनाय नमः ।
ॐ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नाय नमः ।
ॐ सर्वलोकप्रजापतये नमः ।
ॐ महारूपाय नमः ।
ॐ महाकायाय नमः ।
ॐ वृषरूपाय नमः ॥ ४० ॥

ॐ महायशसे नमः ।
ॐ महात्मने नमः ।
ॐ सर्वभूतात्मने नमः ।
ॐ विश्वरूपाय नमः ।
ॐ महाहणवे नमः ।
ॐ लोकपालाय नमः ।
ॐ अन्तर्हितत्मने नमः ।
ॐ प्रसादाय नमः ।
ॐ हयगर्धभये नमः ।
ॐ पवित्राय नमः ॥ ५० ॥

ॐ महते नमः ।
ॐनियमाय नमः ।
ॐ नियमाश्रिताय नमः ।
ॐ सर्वकर्मणे नमः ।
ॐ स्वयंभूताय नमः ।
ॐ आदये नमः ।
ॐ आदिकराय नमः ।
ॐ निधये नमः ।
ॐ सहस्राक्षाय नमः ।
ॐ विशालाक्षाय नमः ॥ ६० ॥

ॐ सोमाय नमः ।
ॐ नक्षत्रसाधकाय नमः ।
ॐ चन्द्राय नमः ।
ॐ सूर्याय नमः ।
ॐ शनये नमः ।
ॐ केतवे नमः ।
ॐ ग्रहाय नमः ।
ॐ ग्रहपतये नमः ।
ॐ वराय नमः ।
ॐ अत्रये नमः ॥ ७० ॥

ॐ अत्र्या नमस्कर्त्रे नमः ।
ॐ मृगबाणार्पणाय नमः ।
ॐ अनघाय नमः ।
ॐ महातपसे नमः ।
ॐ घोरतपसे नमः ।
ॐ अदीनाय नमः ।
ॐ दीनसाधकाय नमः ।
ॐ संवत्सरकराय नमः ।
ॐ मन्त्राय नमः ।
ॐ प्रमाणाय नमः ॥ ८० ॥

ॐ परमायतपसे नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योज्याय नमः ।
ॐ महाबीजाय नमः ।
ॐ महारेतसे नमः ।
ॐ महाबलाय नमः ।
ॐ सुवर्णरेतसे नमः ।
ॐ सर्वज्ञाय नमः ।
ॐ सुबीजाय नमः ।
ॐ बीजवाहनाय नमः ॥ ९० ॥

ॐ दशबाहवे नमः ।
ॐ अनिमिशाय नमः ।
ॐ नीलकण्ठाय नमः ।
ॐ उमापतये नमः ।
ॐ विश्वरूपाय नमः ।
ॐ स्वयंश्रेष्ठाय नमः ।
ॐ बलवीराय नमः ।
ॐ अबलोगणाय नमः ।
ॐ गणकर्त्रे नमः ।
ॐ गणपतये नमः ॥ १०० ॥

ॐ दिग्वाससे नमः ।
ॐ कामाय नमः ।
ॐ मन्त्रविदे नमः ।
ॐ परमाय मन्त्राय नमः ।
ॐ सर्वभावकराय नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ कमण्डलुधराय नमः ।
ॐ धन्विने नमः ।
ॐ बाणहस्ताय नमः ।
ॐ कपालवते नमः ॥ ११० ॥

ॐ अशनये नमः ।
ॐ शतघ्निने नमः ।
ॐ खड्गिने नमः ।
ॐ पट्टिशिने नमः ।
ॐ आयुधिने नमः ।
ॐ महते नमः ।
ॐ स्रुवहस्ताय नमः ।
ॐ सुरूपाय नमः ।
ॐ तेजसे नमः ।
ॐ तेजस्कराय निधये नमः ॥ १२० ॥
ॐ उष्णीषिणे नमः ।
ॐ सुवक्त्राय नमः ।
ॐ उदग्राय नमः ।
ॐ विनताय नमः ।
ॐ दीर्घाय नमः ।
ॐ हरिकेशाय नमः ।
ॐ सुतीर्थाय नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ शृगालरूपाय नमः ।
ॐ सिद्धार्थाय नमः ॥ १३० ॥

ॐ मुण्डाय नमः ।
ॐ सर्वशुभङ्कराय नमः ।
ॐ अजाय नमः ।
ॐ बहुरूपाय नमः ।
ॐ गन्धधारिणे नमः ।
ॐ कपर्दिने नमः ।
ॐ उर्ध्वरेतसे नमः ।
ॐ ऊर्ध्वलिङ्गाय नमः ।
ॐ ऊर्ध्वशायिने नमः ।
ॐ नभस्थलाय नमः ॥ १४० ॥

ॐ त्रिजटिने नमः ।
ॐ चीरवाससे नमः ।
ॐ रुद्राय नमः ।
ॐ सेनापतये नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ अहश्चराय नमः ।
ॐ नक्तंचराय नमः ।
ॐ तिग्ममन्यवे नमः ।
ॐ सुवर्चसाय नमः ।
ॐ गजघ्ने नमः ॥ १५० ॥

ॐ दैत्यघ्ने नमः ।
ॐ कालाय नमः ।
ॐ लोकधात्रे नमः ।
ॐ गुणाकराय नमः ।
ॐ सिंहशार्दूलरूपाय नमः ।
ॐ आर्द्रचर्माम्बरावृताय नमः ।
ॐ कालयोगिने नमः ।
ॐ महानादाय नमः ।
ॐ सर्वकामाय नमः ।
ॐ चतुष्पथाय नमः ॥ १६० ॥

ॐ निशाचराय नमः ।
ॐ प्रेतचारिणे नमः ।
ॐ भूतचारिणे नमः ।
ॐ महेश्वराय नमः ।
ॐ बहुभूताय नमः ।
ॐ बहुधराय नमः ।
ॐ स्वर्भानवे नमः ।
ॐ अमिताय नमः ।
ॐ गतये नमः ।
ॐ नृत्यप्रियाय नमः ॥ १७० ॥

ॐ नित्यनर्ताय नमः ।
ॐ नर्तकाय नमः ।
ॐ सर्वलालसाय नमः ।
ॐ घोराय नमः ।
ॐ महातपसे नमः ।
ॐ पाशाय नमः ।
ॐ नित्याय नमः ।
ॐ गिरिरुहाय नमः ।
ॐ नभसे नमः ।
ॐ सहस्रहस्ताय नमः ॥ १८० ॥

ॐ विजयाय नमः ।
ॐ व्यवसायाय नमः ।
ॐ अतन्द्रिताय नमः ।
ॐ अधर्षणाय नमः ।
ॐ धर्षणात्मने नमः ।
ॐ यज्ञघ्ने नमः ।
ॐ कामनाशकाय नमः ।
ॐ दक्ष्यागपहारिणे नमः ।
ॐ सुसहाय नमः ।
ॐ मध्यमाय नमः ॥ १९० ॥

ॐ तेजोपहारिणे नमः ।
ॐ बलघ्ने नमः ।
ॐ मुदिताय नमः ।
ॐ अर्थाय नमः ।
ॐ अजिताय नमः ।
ॐ अवराय नमः ।
ॐ गम्भीरघोषय नमः ।
ॐ गम्भीराय नमः ।
ॐ गम्भीरबलवाहनाय नमः ।
ॐ न्यग्रोधरूपाय नमः ॥ २०० ॥

ॐ न्यग्रोधाय नमः ।
ॐ वृक्षकर्णस्थिताय नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ सुतीक्ष्णदशनाय नमः ।
ॐ महाकायाय नमः ।
ॐ महाननाय नमः ।
ॐ विश्वक्सेनाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ यज्ञाय नमः ।
ॐ संयुगापीडवाहनाय नमः ॥ २१० ॥

ॐ तीक्षणातापाय नमः ।
ॐ हर्यश्वाय नमः ।
ॐ सहायाय नमः ।
ॐ कर्मकालविदे नमः ।
ॐ विष्णुप्रसादिताय नमः ।
ॐ यज्ञाय नमः ।
ॐ समुद्राय नमः ।
ॐ बडवामुखाय नमः ।
ॐ हुताशनसहायाय नमः ।
ॐ प्रशान्तात्मने नमः ॥ २२० ॥

ॐ हुताशनाय नमः ।
ॐ उग्रतेजसे नमः ।
ॐ महातेजसे नमः ।
ॐ जन्याय नमः ।
ॐ विजयकालविदे नमः ।
ॐ ज्योतिषामयनाय नमः ।
ॐ सिद्धये नमः ।
ॐ सर्वविग्रहाय नमः ।
ॐ शिखिने नमः ।
ॐ मुण्डिने नमः ॥ २३० ॥

ॐ जटिने नमः ।
ॐ ज्वलिने नमः ।
ॐ मूर्तिजाय नमः ।
ॐ मूर्धजाय नमः ।
ॐ बलिने नमः ।
ॐ वैनविने नमः ।
ॐ पणविने नमः ।
ॐ तालिने नमः ।
ॐ खलिने नमः ।
ॐ कालकटङ्कटाय नमः ॥ २४० ॥

ॐ नक्षत्रविग्रहमतये नमः ।
ॐ गुणबुद्धये नमः ।
ॐ लयाय नमः ।
ॐ अगमाय नमः ।
ॐ प्रजापतये नमः ।
ॐ विश्वबाहवे नमः ।
ॐ विभागाय नमः ।
ॐ सर्वगाय नमः ।
ॐ अमुखाय नमः ।
ॐ विमोचनाय नमः ॥ २५० ॥

ॐ सुसरणाय नमः ।
ॐ हिरण्यकवचोद्भवाय नमः ।
ॐ मेढ्रजाय नमः ।
ॐ बलचारिणे नमः ।
ॐ महीचारिणे नमः ।
ॐ स्रुताय नमः ।
ॐ सर्वतूर्यविनोदिने नमः ।
ॐ सर्वतोद्यपरिग्रहाय नमः ।
ॐ व्यालरूपाय नमः ।
ॐ गुहावासिने नमः ॥ २६० ॥

ॐ गुहाय नमः ।
ॐ मालिने नमः ।
ॐ तरङ्गविदे नमः ।
ॐ त्रिदशाय नमः ।
ॐ त्रिकालधृते नमः ।
ॐ कर्मसर्वबन्धविमोचनाय नमः ।
ॐ असुरेन्द्राणांबन्धनाय नमः ।
ॐ युधि शत्रुविनाशनाय नमः ।
ॐ साङ्ख्यप्रसादाय नमः ।
ॐ दुर्वाससे नमः ॥ २७० ॥

ॐ सर्वसाधिनिषेविताय नमः ।
ॐ प्रस्कन्दनाय नमः ।
ॐ यज्ञविभागविदे नमः ।
ॐ अतुल्याय नमः ।
ॐ यज्ञविभागविदे नमः ।
ॐ सर्ववासाय नमः ।
ॐ सर्वचारिणे नमः ।
ॐ दुर्वाससे नमः ।
ॐ वासवाय नमः ।
ॐ अमराय नमः ॥ २८० ॥

ॐ हैमाय नमः ।
ॐ हेमकराय नमः ।
ॐ निष्कर्माय नमः ।
ॐ सर्वधारिणे नमः ।
ॐ धरोत्तमाय नमः ।
ॐ लोहिताक्षाय नमः ।
ॐ माक्षाय नमः ।
ॐ विजयक्षाय नमः ।
ॐ विशारदाय नमः ।
ॐ संग्रहाय नमः ॥ २९० ॥

ॐ निग्रहाय नमः ।
ॐ कर्त्रे नमः ।
ॐ सर्पचीरनिवासनाय नमः ।
ॐ मुख्याय नमः ।
ॐ अमुख्याय नमः ।
ॐ देहाय नमः ।
ॐ काहलये नमः ।
ॐ सर्वकामदाय नमः ।
ॐ सर्वकालप्रसादये नमः ।
ॐ सुबलाय नमः ॥ ३०० ॥

ॐ बलरूपधृते नमः ।
ॐ सर्वकामवराय नमः ।
ॐ सर्वदाय नमः ।
ॐ सर्वतोमुखाय नमः ।
ॐ आकाशनिर्विरूपाय नमः ।
ॐ निपातिने नमः ।
ॐ अवशाय नमः ।
ॐ खगाय नमः ।
ॐ रौद्ररूपाय नमः ।
ॐ अंशवे नमः ॥ ३१० ॥

ॐ आदित्याय नमः ।
ॐ बहुरश्मये नमः ।
ॐ सुवर्चसिने नमः ।
ॐ वसुवेगाय नमः ।
ॐ महावेगाय नमः ।
ॐ मनोवेगाय नमः ।
ॐ निशाचराय नमः ।
ॐ सर्ववासिने नमः ।
ॐ श्रियावासिने नमः ।
ॐ उपदेशकराय नमः ॥ ३२० ॥

ॐ अकराय नमः ।
ॐ मुनये नमः ।
ॐ आत्मनिरालोकाय नमः ।
ॐ सम्भग्नाय नमः ।
ॐ सहस्रदाय नमः ।
ॐ पक्षिणे नमः ।
ॐ पक्षरूपाय नमः ।
ॐ अतिदीप्ताय नमः ।
ॐ विशाम्पतये नमः ।
ॐ उन्मादाय नमः ॥ ३३० ॥

ॐ मदनाय नमः ।
ॐ कामाय नमः ।
ॐ अश्वत्थाय नमः ।
ॐ अर्थकराय नमः ।
ॐ यशसे नमः ।
ॐ वामदेवाय नमः ।
ॐ वामाय नमः ।
ॐ प्राचे नमः ।
ॐ दक्षिणाय नमः ।
ॐ वामनाय नमः ॥ ३४० ॥

ॐ सिद्धयोगिने नमः ।
ॐ महर्शये नमः ।
ॐ सिद्धार्थाय नमः ।
ॐ सिद्धसाधकाय नमः ।
ॐ भिक्षवे नमः ।
ॐ भिक्षुरूपाय नमः ।
ॐ विपणाय नमः ।
ॐ मृदवे नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ महासेनाय नमः ॥ ३५० ॥

ॐ विशाखाय नमः ।
ॐ षष्टिभागाय नमः ।
ॐ गवां पतये नमः ।
ॐ वज्रहस्ताय नमः ।
ॐ विष्कम्भिने नमः ।
ॐ चमूस्तम्भनाय नमः ।
ॐ वृत्तावृत्तकराय नमः ।
ॐ तालाय नमः ।
ॐ मधवे नमः ।
ॐ मधुकलोचनाय नमः ॥ ३६० ॥

ॐ वाचस्पत्याय नमः ।
ॐ वाजसेनाय नमः ।
ॐ नित्यमाश्रितपूजिताय नमः ।
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।
ॐ लोकचारिणे नमः ।
ॐ सर्वचारिणे नमः ।
ॐ विचारविदे नमः ।
ॐ ईशानाय नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ कालाय नमः ॥ ३७० ॥

ॐ निशाचारिणे नमः ।
ॐ पिनाकभृते नमः ।
ॐ निमित्तस्थाय नमः ।
ॐ निमित्ताय नमः ।
ॐ नन्दये नमः ।
ॐ नन्दिकराय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ नन्दीश्वराय नमः ।
ॐ नन्दिने नमः ।
ॐ नन्दनाय नमः ॥ ३८० ॥

ॐ नन्दिवर्धनाय नमः ।
ॐ भगहारिणे नमः ।
ॐ निहन्त्रे नमः ।
ॐ कलाय नमः ।
ॐ ब्रह्मणे नमः ।
ॐ पितामहाय नमः ।
ॐ चतुर्मुखाय नमः ।
ॐ महालिङ्गाय नमः ।
ॐ चारुलिङ्गाय नमः ।
ॐ लिङ्गाध्याक्षाय नमः ॥ ३९० ॥
ॐ सुराध्यक्षाय नमः ।
ॐ योगाध्यक्षाय नमः ।
ॐ युगावहाय नमः ।
ॐ बीजाध्यक्षाय नमः ।
ॐ बीजकर्त्रे नमः ।
ॐ अध्यात्मानुगताय नमः ।
ॐ बलाय नमः ।
ॐ इतिहासाय नमः ।
ॐ सकल्पाय नमः ।
ॐ गौतमाय नमः ॥ ४०० ॥

ॐ निशाकराय नमः ।
ॐ दम्भाय नमः ।
ॐ अदम्भाय नमः ।
ॐ वैदम्भाय नमः ।
ॐ वश्याय नमः ।
ॐ वशकराय नमः ।
ॐ कलये नमः ।
ॐ लोककर्त्रे नमः ।
ॐ पशुपतये नमः ।
ॐ महाकर्त्रे नमः ॥ ४१० ॥

ॐ अनौषधाय नमः ।
ॐ अक्षराय नमः ।
ॐ परमाय ब्रह्मणे नमः ।
ॐ बलवते नमः ।
ॐ शक्राय नमः ।
ॐ नित्यै नमः ।
ॐ अनित्यै नमः ।
ॐ शुद्धात्मने नमः ।
ॐ शुद्धाय नमः ।
ॐ मान्याय नमः ॥ ४२० ॥

ॐ गतागताय नमः ।
ॐ बहुप्रसादाय नमः ।
ॐ सुस्वप्नाय नमः ।
ॐ दर्पणाय नमः ।
ॐ अमित्रजिते नमः ।
ॐ वेदकाराय नमः ।
ॐ मन्त्रकाराय नमः ।
ॐ विदुषे नमः ।
ॐ समरमर्दनाय नमः ।
ॐ महामेघनिवासिने नमः ॥ ४३० ॥

ॐ महाघोराय नमः ।
ॐ वशिने नमः ।
ॐ कराय नमः ।
ॐ अग्निज्वालाय नमः ।
ॐ महाज्वालाय नमः ।
ॐ अतिधूम्राय नमः ।
ॐ हुताय नमः ।
ॐ हविषे नमः ।
ॐ वृषणाय नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ॥ ४४० ॥

ॐ नित्यं वर्चस्विने नमः ।
ॐ धूमकेतनाय नमः ।
ॐ नीलाय नमः ।
ॐ अङ्गलुब्धाय नमः ।
ॐ शोभनाय नमः ।
ॐ निरवग्रहाय नमः ।
ॐ स्वस्तिदाय नमः ।
ॐ स्वस्तिभावाय नमः ।
ॐ भागिने नमः ।
ॐ भागकराय नमः ॥ ४५० ॥

ॐ लघवे नमः ।
ॐ उत्सङ्गाय नमः ।
ॐ महाङ्गाय नमः ।
ॐ महागर्भपरायणाय नमः ।
ॐ कृष्णवर्णाय नमः ।
ॐ सुवर्णाय नमः ।
ॐ सर्वदेहिनां इन्द्रियाय नमः ।
ॐ महापादाय नमः ।
ॐ महाहस्ताय नमः ।
ॐ महाकायाय नमः ॥ ४६० ॥

ॐ महायशसे नमः ।
ॐ महामूर्ध्ने नमः ।
ॐ महामात्राय नमः ।
ॐ महानेत्राय नमः ।
ॐ निशालयाय नमः ।
ॐ महान्तकाय नमः ।
ॐ महाकर्णाय नमः ।
ॐ महोष्ठाय नमः ।
ॐ महाहणवे नमः ।
ॐ महानासाय नमः ॥ ४७० ॥

ॐ महाकम्बवे नमः ।
ॐ महाग्रीवाय नमः ।
ॐ श्मशानभाजे नमः ।
ॐ महावक्षसे नमः ।
ॐ महोरस्काय नमः ।
ॐ अन्तरात्मने नमः ।
ॐ मृगालयाय नमः ।
ॐ लम्बनाय नमः ।
ॐ लम्बितोष्ठाय नमः ।
ॐ महामायाय नमः ॥ ४८० ॥

ॐ पयोनिधये नमः ।
ॐ महादन्ताय नमः ।
ॐ महादंष्ट्राय नमः ।
ॐ महजिह्वाय नमः ।
ॐ महामुखाय नमः ।
ॐ महानखाय नमः ।
ॐ महारोमाय नमः ।
ॐ महाकोशाय नमः ।
ॐ महाजटाय नमः ।
ॐ प्रसन्नाय नमः ॥ ४९० ॥

ॐ प्रसादाय नमः ।
ॐ प्रत्ययाय नमः ।
ॐ गिरिसाधनाय नमः ।
ॐ स्नेहनाय नमः ।
ॐ अस्नेहनाय नमः ।
ॐ अजिताय नमः ।
ॐ महामुनये नमः ।
ॐ वृक्षाकाराय नमः ।
ॐ वृक्षकेतवे नमः ।
ॐ अनलाय नमः ॥ ५०० ॥

ॐ वायुवाहनाय नमः ।
ॐ गण्डलिने नमः ।
ॐ मेरुधाम्ने नमः ।
ॐ देवाधिपतये नमः ।
ॐ अथर्वशीर्षाय नमः ।
ॐ सामास्याय नमः ।
ॐ ऋक्सहस्रामितेक्षणाय नमः ।
ॐ यजुः पाद भुजाय नमः ।
ॐ गुह्याय नमः ।
ॐ प्रकाशाय नमः ॥ ५१० ॥

ॐ जङ्गमाय नमः ।
ॐ अमोघार्थाय नमः ।
ॐ प्रसादाय नमः ।
ॐ अभिगम्याय नमः ।
ॐ सुदर्शनाय नमः ।
ॐ उपकाराय नमः ।
ॐ प्रियाय नमः ।
ॐ सर्वाय नमः ।
ॐ कनकाय नमः ।
ॐ कञ्चनच्छवये नमः ॥ ५२० ॥
ॐ नाभये नमः ।
ॐ नन्दिकराय नमः ।
ॐ भावाय नमः ।
ॐ पुष्करस्थापतये नमः ।
ॐ स्थिराय नमः ।
ॐ द्वादशाय नमः ।
ॐ त्रासनाय नमः ।
ॐ आद्याय नमः ।
ॐ यज्ञाय नमः ।
ॐ यज्ञसमाहिताय नमः ॥ ५३० ॥

ॐ नक्तं नमः ।
ॐ कलये नमः ।
ॐ कालाय नमः ।
ॐ मकराय नमः ।
ॐ कालपूजिताय नमः ।
ॐ सगणाय नमः ।
ॐ गणकाराय नमः ।
ॐ भूतवाहनसारथये नमः ।
ॐ भस्मशयाय नमः ।
ॐ भस्मगोप्त्रे नमः ॥ ५४० ॥

ॐ भस्मभूताय नमः ।
ॐ तरवे नमः ।
ॐ गणाय नमः ।
ॐ लोकपालाय नमः ।
ॐ अलोकाय नमः ।
ॐ महात्मने नमः ।
ॐ सर्वपूजिताय नमः ।
ॐ शुक्लाय नमः ।
ॐ त्रिशुक्लाय नमः ।
ॐ सम्पन्नाय नमः ॥ ५५० ॥

ॐ शुचये नमः ।
ॐ भूतनिषेविताय नमः ।
ॐ आश्रमस्थाय नमः ।
ॐ क्रियावस्थाय नमः ।
ॐ विश्वकर्ममतये नमः ।
ॐ वराय नमः ।
ॐ विशालशाखाय नमः ।
ॐ ताम्रोष्ठाय नमः ।
ॐ अम्बुजालाय नमः ।
ॐ सुनिश्चलाय नमः ॥ ५६० ॥

ॐ कपिलाय नमः ।
ॐ कपिशाय नमः ।
ॐ शुक्लाय नमः ।
ॐ अयुशे नमः ।
ॐ पराय नमः ।
ॐ अपराय नमः ।
ॐ गन्धर्वाय नमः ।
ॐ अदितये नमः ।
ॐ तार्क्ष्याय नमः ।
ॐ सुविज्ञेयाय नमः ॥ ५७० ॥

ऊँ सुशारदाय नमः ।
ऊँ परश्वधायुधाय नमः ।
ऊँ देवाय नमः ।
ऊँ अनुकारिणे नमः ।
ऊँ सुबान्धवाय नमः ।
ऊँ तुम्बवीणाय नमः ।
ऊँ महाक्रोधाय नमः ।
ऊँ ऊर्ध्वरेतसे नमः ।
ऊँ जलेशयाय नमः ।
ऊँ उग्राय नमः ।

ऊँ वंशकराय नमः ।
ऊँ वंशाय नमः ।
ऊँ वंशानादाय नमः ।
ऊँ अनिन्दिताय नमः ।
ऊँ सर्वांगरूपाय नमः ।
ऊँ मायाविने नमः ।
ऊँ सुहृदे नमः ।
ऊँ अनिलाय नमः ।
ऊँ अनलाय नमः ।
ऊँ बन्धनाय नमः ।

ऊँ बन्धकर्त्रे नमः ।
ऊँ सुवन्धनविमोचनाय नमः ।
ऊँ सयज्ञयारये नमः ।
ऊँ सकामारये नमः ।
ऊँ महाद्रष्टाय नमः ।
ऊँ महायुधाय नमः ।
ऊँ बहुधानिन्दिताय नमः ।
ऊँ शर्वाय नमः ।
ऊँ शंकराय नमः ।
ऊँ शं कराय नमः ।
ऊँ अधनाय नमः ॥ ६०० ॥

ऊँ अमरेशाय नमः ।
ऊँ महादेवाय नमः ।
ऊँ विश्वदेवाय नमः ।
ऊँ सुरारिघ्ने नमः ।
ऊँ अहिर्बुद्धिन्याय नमः ।
ऊँ अनिलाभाय नमः ।
ऊँ चेकितानाय नमः ।
ऊँ हविषे नमः ।
ऊँ अजैकपादे नमः ।
ऊँ कापालिने नमः ।

ऊँ त्रिशंकवे नमः ।
ऊँ अजिताय नमः ।
ऊँ शिवाय नमः ।
ऊँ धन्वन्तरये नमः ।
ऊँ धूमकेतवे नमः ।
ऊँ स्कन्दाय नमः ।
ऊँ वैश्रवणाय नमः ।
ऊँ धात्रे नमः ।
ऊँ शक्राय नमः ।
ऊँ विष्णवे नमः ।

ऊँ मित्राय नमः ।
ऊँ त्वष्ट्रे नमः ।
ऊँ ध्रुवाय नमः ।
ऊँ धराय नमः ।
ऊँ प्रभावाय नमः ।
ऊँ सर्वगोवायवे नमः ।
ऊँ अर्यम्णे नमः ।
ऊँ सवित्रे नमः ।
ऊँ रवये नमः ।
ऊँ उषंगवे नमः ।

ऊँ विधात्रे नमः ।
ऊँ मानधात्रे नमः ।
ऊँ भूतवाहनाय नमः ।
ऊँ विभवे नमः ।
ऊँ वर्णविभाविने नमः ।
ऊँ सर्वकामगुणवाहनाय नमः ।
ऊँ पद्मनाभाय नमः ।
ऊँ महागर्भाय नमः ।
चन्द्रवक्त्राय नमः ।
ऊँ अनिलाय नमः ।

ऊँ अनलाय नमः ।
ऊँ बलवते नमः ।
ऊँ उपशान्ताय नमः ।
ऊँ पुराणाय नमः ।
ऊँ पुण्यचञ्चवे नमः ।
ऊँ ईरूपाय नमः ।
ऊँ कुरूकर्त्रे नमः ।
ऊँ कुरूवासिने नमः ।
ऊँ कुरूभूताय नमः ।
ऊँ गुणौषधाय नमः ॥ ६५० ॥

ऊँ सर्वाशयाय नमः ।
ऊँ दर्भचारिणे नमः ।
ऊँ सर्वप्राणिपतये नमः ।
ऊँ देवदेवाय नमः ।
ऊँ सुखासक्ताय नमः ।
ऊँ सत स्वरूपाय नमः ।
ऊँ असत् रूपाय नमः ।
ऊँ सर्वरत्नविदे नमः ।
ऊँ कैलाशगिरिवासने नमः ।
ऊँ हिमवद्गिरिसंश्रयाय नमः ।

ऊँ कूलहारिणे नमः ।
ऊँ कुलकर्त्रे नमः ।
ऊँ बहुविद्याय नमः ।
ऊँ बहुप्रदाय नमः ।
ऊँ वणिजाय नमः ।
ऊँ वर्धकिने नमः ।
ऊँ वृक्षाय नमः ।
ऊँ बकुलाय नमः ।
ऊँ चंदनाय नमः ।
ऊँ छदाय नमः ।

ऊँ सारग्रीवाय नमः ।
ऊँ महाजत्रवे नमः ।
ऊँ अलोलाय नमः ।
ऊँ महौषधाय नमः ।
ऊँ सिद्धार्थकारिणे नमः ।
ऊँ छन्दोव्याकरणोत्तर-सिद्धार्थाय नमः ।
ऊँ सिंहनादाय नमः ।
ऊँ सिंहद्रंष्टाय नमः ।
ऊँ सिंहगाय नमः ।
ऊँ सिंहवाहनाय नमः ।

ऊँ प्रभावात्मने नमः ।
ऊँ जगतकालस्थालाय नमः ।
ऊँ लोकहिताय नमः ।
ऊँ तरवे नमः ।
ऊँ सारंगाय नमः ।
ऊँ नवचक्रांगाय नमः ।
ऊँ केतुमालिने नमः ।
ऊँ सभावनाय नमः ।
ऊँ भूतालयाय नमः ।
ऊँ भूतपतये नमः ।

ऊँ अहोरात्राय नमः ।
ऊँ अनिन्दिताय नमः ।
ऊँ सर्वभूतवाहित्रे नमः ।
ऊँ सर्वभूतनिलयाय नमः ।
ऊँ विभवे नमः ।
ऊँ भवाय नमः ।
ऊँ अमोघाय नमः ।
ऊँ संयताय नमः ।
ऊँ अश्वाय नमः ।
ऊँ भोजनाय नमः ॥ ७००॥

ऊँ प्राणधारणाय नमः ।
ऊँ धृतिमते नमः ।
ऊँ मतिमते नमः ।
ऊँ दक्षाय नमःऊँ सत्कृयाय नमः ।
ऊँ युगाधिपाय नमः ।
ऊँ गोपाल्यै नमः ।
ऊँ गोपतये नमः ।
ऊँ ग्रामाय नमः ।
ऊँ गोचर्मवसनाय नमः ।
ऊँ हरये नमः ।

ऊँ हिरण्यबाहवे नमः ।
ऊँ प्रवेशिनांगुहापालाय नमः ।
ऊँ प्रकृष्टारये नमः ।
ऊँ महाहर्षाय नमः ।
ऊँ जितकामाय नमः ।
ऊँ जितेन्द्रियाय नमः ।
ऊँ गांधाराय नमः ।
ऊँ सुवासाय नमः ।
ऊँ तपःसक्ताय नमः ।
ऊँ रतये नमः ।

ऊँ नराय नमः ।
ऊँ महागीताय नमः ।
ऊँ महानृत्याय नमः ।
ऊँ अप्सरोगणसेविताय नमः ।
ऊँ महाकेतवे नमः ।
ऊँ महाधातवे नमः ।
ऊँ नैकसानुचराय नमः ।
ऊँ चलाय नमः ।
ऊँ आवेदनीयाय नमः ।
ऊँ आदेशाय नमः ।

ऊँ सर्वगंधसुखावहाय नमः ।
ऊँ तोरणाय नमः ।
ऊँ तारणाय नमः ।
ऊँ वाताय नमः ।
ऊँ परिधये नमः ।
ऊँ पतिखेचराय नमः ।
ऊँ संयोगवर्धनाय नमः ।
ऊँ वृद्धाय नमः ।
ऊँ गुणाधिकाय नमः ।
ऊँ अतिवृद्धाय नमः ।

ऊँ नित्यात्मसहायाय नमः ।
ऊँ देवासुरपतये नमः ।
ऊँ पत्ये नमः ।
ऊँ युक्ताय नमः ।
ऊँ युक्तबाहवे नमः ।
ऊँ दिविसुपर्वदेवाय नमः ।
ऊँ आषाढाय नमः ।
ऊँ सुषाढ़ाय नमः ।
ऊँ ध्रुवाय नमः ॥ ७५० ॥

ऊँ हरिणाय नमः ।
ऊँ हराय नमः ।
ऊँ आवर्तमानवपुषे नमः ।
ऊँ वसुश्रेष्ठाय नमः ।
ऊँ महापथाय नमः ।
ऊँ विमर्षशिरोहारिणे नमः ।
ऊँ सर्वलक्षणलक्षिताय नमः ।
ऊँ अक्षरथयोगिने नमः ।
ऊँ सर्वयोगिने नमः ।
ऊँ महाबलाय नमः ।

ऊँ समाम्नायाय नमः ।
ऊँ असाम्नायाय नमः ।
ऊँ तीर्थदेवाय नमः ।
ऊँ महारथाय नमः ।
ऊँ निर्जीवाय नमः ।
ऊँ जीवनाय नमः ।
ऊँ मंत्राय नमः ।
ऊँ शुभाक्षाय नमः ।
ऊँ बहुकर्कशाय नमः ।
ऊँ रत्नप्रभूताय नमः ।

ऊँ रत्नांगाय नमः ।
ऊँ महार्णवनिपानविदे नमः ।
ऊँ मूलाय नमः ।
ऊँ विशालाय नमः ।
ऊँ अमृताय नमः ।
ऊँ व्यक्ताव्यवक्ताय नमः ।
ऊँ तपोनिधये नमः ।
ऊँ आरोहणाय नमः ।
ऊँ अधिरोहाय नमः ।
ऊँ शीलधारिणे नमः ।

ऊँ महायशसे नमः ।
ऊँ सेनाकल्पाय नमः ।
ऊँ महाकल्पाय नमः ।
ऊँ योगाय नमः ।
ऊँ युगकराय नमः ।
ऊँ हरये नमः ।
ऊँ युगरूपाय नमः ।
ऊँ महारूपाय नमः ।
ऊँ महानागहतकाय नमः ।
ऊँ अवधाय नमः ।

ऊँ न्यायनिर्वपणाय नमः ।
ऊँ पादाय नमः ।
ऊँ पण्डिताय नमः ।
ऊँ अचलोपमाय नमः ।
ऊँ बहुमालाय नमः ।
ऊँ महामालाय नमः ।
ऊँ शशिहरसुलोचनाय नमः ।
ऊँ विस्तारलवणकूपाय नमः ।
ऊँ त्रिगुणाय नमः ।
ऊँ सफलोदयाय नमः ॥ ८०० ॥

ऊँ त्रिलोचनाय नमः ।
ऊँ विषण्डागाय नमः ।
ऊँ मणिविद्धाय नमः ।
ऊँ जटाधराय नमः ।
ऊँ बिन्दवे नमः ।
ऊँ विसर्गाय नमः ।
ऊँ सुमुखाय नमः ।
ऊँ शराय नमः ।
ऊँ सर्वायुधाय नमः ।
ऊँ सहाय नमः ।

ऊँ सहाय नमः ।
ऊँ निवेदनाय नमः ।
ऊँ सुखाजाताय नमः ।
ऊँ सुगन्धराय नमः ।
ऊँ महाधनुषे नमः ।
ऊँ गंधपालिभगवते नमः ।
ऊँ सर्वकर्मोत्थानाय नमः ।
ऊँ मन्थानबहुलवायवे नमः ।
ऊँ सकलाय नमः ।
ऊँ सर्वलोचनाय नमः ।

ऊँ तलस्तालाय नमः ।
ऊँ करस्थालिने नमः ।
ऊँ ऊर्ध्वसंहननाय नमः ।
ऊँ महते नमः ।
ऊँ छात्राय नमः ।
ऊँ सुच्छत्राय नमः ।
ऊँ विख्यातलोकाय नमः ।
ऊँ सर्वाश्रयक्रमाय नमः ।
ऊँ मुण्डाय नमः ।
ऊँ विरूपाय नमः ।

ऊँ विकृताय नमः ।
ऊँ दण्डिने नमः ।
ऊँ कुदण्डिने नमः ।
ऊँ विकुर्वणाय नमः ।
ऊँ हर्यक्षाय नमः ।
ऊँ ककुभाय नमः ।
ऊँ वज्रिणे नमः ।
ऊँ शतजिह्वाय नमः ।
ऊँ सहस्रपदे नमः ।
ऊँ देवेन्द्राय नमः ।

ऊँ सर्वदेवमयाय नमः ।
ऊँ गुरवे नमः ।
ऊँ सहस्रबाहवे नमः ।
ऊँ सर्वांगाय नमः ।
ऊँ शरण्याय नमः ।
ऊँ सर्वलोककृते नमः ।
ऊँ पवित्राय नमः ।
ऊँ त्रिककुन्मंत्राय नमः ।
ऊँ कनिष्ठाय नमः ।
ऊँ कृष्णपिंगलाय नमः ॥ ८५० ॥

ऊँ ब्रह्मदण्डविनिर्मात्रे नमः ।
ऊँ शतघ्नीपाशशक्तिमते नमः ।
ऊँ पद्मगर्भाय नमः ।
ऊँ महागर्भाय नमः ।
ऊँ ब्रह्मगर्भाय नमः ।
ऊँ जलोद्भावाय नमः ।
ऊँ गभस्तये नमः ।
ऊँ ब्रह्मकृते नमः ।
ऊँ ब्रह्मिणे नमः ।
ऊँ ब्रह्मविदे नमः ।

ऊँ ब्राह्मणाय नमः ।
ऊँ गतये नमः ।
ऊँ अनंतरूपाय नमः ।
ऊँ नैकात्मने नमः ।
ऊँ स्वयंभुवतिग्मतेजसे नमः ।
ऊँ उर्ध्वगात्मने नमः ।
ऊँ पशुपतये नमः ।
ऊँ वातरंहसे नमः ।
ऊँ मनोजवाय नमः ।
ऊँ चंदनिने नमः ।

ऊँ पद्मनालाग्राय नमः ।
ऊँ सुरभ्युत्तारणाय नमः ।
ऊँ नराय नमः ।
ऊँ कर्णिकारमहास्रग्विणमे नमः ।
ऊँ नीलमौलये नमः ।
ऊँ पिनाकधृषे नमः ।
ऊँ उमापतये नमः ।
ऊँ उमाकान्ताय नमः ।
ऊँ जाह्नवीधृषे नमः ।
ऊँ उमादवाय नमः ।

ऊँ वरवराहाय नमः ।
ऊँ वरदाय नमः ।
ऊँ वरेण्याय नमः ।
ऊँ सुमहास्वनाय नमः ।
ऊँ महाप्रसादाय नमः ।
ऊँ दमनाय नमः ।
ऊँ शत्रुघ्ने नमः ।
ऊँ श्वेतपिंगलाय नमः ।
ऊँ पीतात्मने नमः ।
ऊँ परमात्मने नमः ।

ऊँ प्रयतात्मने नमः ।
ऊँ प्रधानधृषे नमः ।
ऊँ सर्वपार्श्वमुखाय नमः ।
ऊँ त्रक्षाय नमः ।
ऊँ धर्मसाधारणवराय नमः ।
ऊँ चराचरात्मने नमः ।
ऊँ सूक्ष्मात्मने नमः ।
ऊँ अमृतगोवृषेश्वराय नमः ।
ऊँ साध्यर्षये नमः ।
ऊँ आदित्यवसवे नमः ॥ ९०० ॥

ऊँ विवस्वत्सवित्रमृताय नमः ।
ऊँ व्यासाय नमः ।
ऊँ सर्गसुसंक्षेपविस्तराय नमः ।
ऊँ पर्ययोनराय नमः ।
ऊँ ऋतवे नमः ।
ऊँ संवत्सराय नमः ।
ऊँ मासाय नमः ।
ऊँ पक्षाय नमः ।
ऊँ संख्यासमापनाय नमः ।
ऊँ कलायै नमः ।

ऊँ काष्ठायै नमः ।
ऊँ लवेभ्यो नमः ।
ऊँ मात्रेभ्यो नमः ।
ऊँ मुहूर्ताहःक्षपाभ्यो नमः ।
ऊँ क्षणेभ्यो नमः ।
ऊँ विश्वक्षेत्राय नमः ।
ऊँ प्रजाबीजाय नमः ।
ऊँ लिंगाय नमः ।
ऊँ आद्यनिर्गमाय नमः ।
ऊँ सत् स्वरूपाय नमः ।

ऊँ असत् रूपाय नमः ।
ऊँ व्यक्ताय नमः ।
ऊँ अव्यक्ताय नमः ।
ऊँ पित्रे नमः । ऊँ मात्रे नमः ।
ऊँ पितामहाय नमः ।
ऊँ स्वर्गद्वाराय नमः ।
ऊँ प्रजाद्वाराय नमः ।
ऊँ मोक्षद्वाराय नमः ।
ऊँ त्रिविष्टपाय नमः ।
ऊँ निर्वाणाय नमः ।

ऊँ ह्लादनाय नमः ।
ऊँ ब्रह्मलोकाय नमः ।
ऊँ परागतये नमः ।
ऊँ देवासुरविनिर्मात्रे नमः ।
ऊँ देवासुरपरायणाय नमः ।
ऊँ देवासुरगुरूवे नमः ।
ऊँ देवाय नमः ।
ऊँ देवासुरनमस्कृताय नमः ।
ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः ।
ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः ।

ऊँ देवासुरगणाश्रयाय नमः ।
ऊँ देवासुरगणाध्यक्षाय नमः ।
ऊँ देवासुरगणाग्रण्ये नमः ।
ऊँ देवातिदेवाय नमः ।
ऊँ देवर्षये नमः ।
ऊँ देवासुरवरप्रदाय नमः ।
ऊँ विश्वाय नमः ।
ऊँ देवासुरमहेश्वराय नमः ।
ऊँ सर्वदेवमयाय नमः ॥ ९५० ॥

ऊँ अचिंत्याय नमः ।
ऊँ देवात्मने नमः ।
ऊँ आत्मसंबवाय नमः ।
ऊँ उद्भिदे नमः ।
ऊँ त्रिविक्रमाय नमः ।
ऊँ वैद्याय नमः ।
ऊँ विरजाय नमः ।
ऊँ नीरजाय नमः ।
ऊँ अमराय नमः ।
ऊँ इड्याय नमः ।

ऊँ हस्तीश्वराय नमः ।
ऊँ व्याघ्राय नमः ।
ऊँ देवसिंहाय नमः ।
ऊँ नरर्षभाय नमः ।
ऊँ विभुदाय नमः ।
ऊँ अग्रवराय नमः ।
ऊँ सूक्ष्माय नमः ।
ऊँ सर्वदेवाय नमः ।
ऊँ तपोमयाय नमः ।
ऊँ सुयुक्ताय नमः ।

ऊँ शोभनाय नमः ।
ऊँ वज्रिणे नमः ।
ऊँ प्रासानाम्प्रभवाय नमः ।
ऊँ अव्ययाय नमः ।
ऊँ गुहाय नमः ।
ऊँ कान्ताय नमः ।
ऊँ निजसर्गाय नमः ।
ऊँ पवित्राय नमः ।
ऊँ सर्वपावनाय नमः ।
ऊँ श्रृंगिणे नमः ।

ऊँ श्रृंगप्रियाय नमः ।
ऊँ बभ्रवे नमः ।
ऊँ राजराजाय नमः ।
ऊँ निरामयाय नमः ।
ऊँ अभिरामाय नमः ।
ऊँ सुरगणाय नमः ।
ऊँ विरामाय नमः ।
ऊँ सर्वसाधनाय नमः ।
ऊँ ललाटाक्षाय नमः ।
ऊँ विश्वदेवाय नमः ।

ऊँ हरिणाय नमः ।
ऊँ ब्रह्मवर्चसे नमः ।
ऊँ स्थावरपतये नमः ।
ऊँ नियमेन्द्रियवर्धनाय नमः ।
ऊँ सिद्धार्थाय नमः ।
ऊँ सिद्धभूतार्थाय नमः ।
ऊँ अचिन्ताय नमः ।
ऊँ सत्यव्रताय नमः ।
ऊँ शुचये नमः ।
ऊँ व्रताधिपाय नमः ॥ १००० ॥

ऊँ पराय नमः ।
ऊँ ब्रह्मणे नमः ।
ऊँ भक्तानांपरमागतये नमः ।
ऊँ विमुक्ताय नमः ।
ऊँ मुक्ततेजसे नमः ।
ऊँ श्रीमते नमः ।
ऊँ श्रीवर्धनाय नमः ।
ऊँ श्री जगते नमः ॥ १००८ ॥

क्षमा प्रार्थना

आबाहनं न जानामि नैव जानामि पूजनम् ।विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।।1।।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।यत्पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे ।।2।।

यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।तत्सव क्षम्यतो देव प्रसीद परमेश्वर ।।3।।

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्योवन्दे तमच्युतम् ।।4।।

प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषुयत् ।स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णः स्यादिति श्रुतिः ।।5।।

साष्टांग नमस्कार

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ।।

नमो ब्रह्मणयदेवाय गौब्राह्मणहिताय च ।जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् ।देवकी परमानन्दं कृष्णं बन्दे जगद्गुरुम् ।।

शुभ कामना

स्वस्ति प्रजाभ्य परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः ।गोब्राह्मणेभ्यो शुभमस्तु नित्यं, लोकासमता सुखिनोभवन्तु ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात् ।।2।।

अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः ।निर्धनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ।।3।।

श्रद्धां मेधा यशः प्रज्ञां विद्यां पुष्टि श्रियं बलम् ।तेज आयुष्यमारोग्यं देहि मे हव्यवाहन ।।4।।

शांति पाठ

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्ति रापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु ।।

 समर्पणम्:

उत्तराणी में जल लेकर, निम्नलिखित दो मंत्रों का उच्चारण करते हुए, जल को पृथ्वी को अर्पित करें।

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम्।

सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्मयी स्थिरा॥

गुह्यतिगुह्यगोप्त त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम्|

सिद्धिर्भवतु मे देवा त्वत्प्रसादान्मयी स्थिरा |

 

सनातन उद्घोष

धर्म की जय हो: सदाचारी और सत्य के मार्ग की विजय हो।

अधर्म का नाश हो: बुराई, अन्याय और अनैतिकता का अंत हो।

प्राणियों में सद्भावना हो: सभी जीवों के प्रति प्रेम, करुणा और भाईचारा हो।

विश्व का कल्याण हो: मानवता और पूरे संसार का भला हो।

 

 

शिव पूजा विधि:

  1. पूजा सामग्री: जल, दूध, दही, घी, शहद, चीनी (पंचामृत), बेलपत्र, धतूरा, भांग, चन्दन, भस्म, और फूल।
  2. विधि:
  3. विशेष अनुष्ठान: महाशिवरात्रि या सोमवार, शिवरात्रि, श्रावण मास और प्रदोष जैसे शुभ अवसरों पर अत्यंत फलदायी , रुद्राभिषेक करना सबसे उत्तम माना जाता है।
  4. विनम्रतापूर्वक अपनी इच्छा व्यक्त करें: अर्पण और मंत्रोच्चार के बाद, ध्यान करें और भगवान शिव से अपनी इच्छा व्यक्त करें, उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। विनम्रता से प्रार्थना करें, उनकी इच्छा को स्वीकार करें।
  5. अनासक्ति का अभ्यास करें: शिव के दर्शन के अनुसार, अनासक्ति का अभ्यास करें और दैवीय समय पर भरोसा रखें। अपनी इच्छा को समर्पित करें और परिणाम को शिव की कृपा के रूप में स्वीकार करें

  6. धार्मिक जीवन जिएं:

    सत्य, करुणा और आत्म-अनुशासन के मार्ग का अनुसरण करें (जैसा कि भगवान शिव सिखाते हैं), क्योंकि धार्मिक जीवन शिव को प्रसन्न करता है।
  7.  
    याद रखें:

    भगवान शिव से प्रार्थना का सार भक्ति, विनम्रता और समर्पण है। इच्छा पूर्ति केवल मांगने से     नहीं होती, बल्कि स्वयं को शिव के मूल्यों के साथ संरेखित करने और उनकी दिव्य इच्छा को स्वीकार करने से होती है।
  8.  
    शिव स्तुति के कुछ लाभ
    :


मनोकामना पूर्ति:

सच्चे मन से पूजा करने पर मनवांछित फल मिलता है।


शांति और स्वास्थ्य:

महामृत्युंजय मंत्र से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और आरोग्य मिलता है।


आध्यात्मिक उन्नति:
भगवान शिव ज्ञान, मोक्ष और शांति के प्रदाता हैं।

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