Jagrayam Foundation

षट् चक्र ( सातों ) चक्रों के बीज मंत्र उनका प्रभाव

षट् चक्र (सातों ) चक्रों के बीज मंत्र उनका प्रभाव
योग और तंत्र शास्त्र के अनुसार षट्चक्र मानव शरीर के भीतर स्थित छह मुख्य सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र (चक्र) हैं, जो रीढ़ की हड्डी (मेरुदण्ड) के मार्ग में स्थित होते हैं।
षट्चक्रों के नाम और स्थिति
योग ग्रंथों में मुख्य रूप से इन छह चक्रों का वर्णन किया गया है:
  • मूलाधार चक्र: यह गुदा और लिंग मूल के मध्य स्थित होता है, जो स्थिरता और सुरक्षा से जुड़ा है।
  • स्वाधिष्ठान चक्र: यह लिंग मूल से कुछ ऊपर स्थित होता है और इसकी छह पंखुड़ियां होती हैं।
  • मणिपूर चक्र: यह नाभि के क्षेत्र में स्थित होता है और ऊर्जा तथा आत्मविश्वास का केंद्र माना जाता है।
  • अनाहत चक्र: यह हृदय के पास छाती के मध्य में स्थित होता है, जो प्रेम और संवेदना से जुड़ा है।
  • विशुद्ध चक्र: यह कंठ (गले) के पास स्थित होता है, जो संवाद और शुद्धि का प्रतीक है।
  • आज्ञा चक्र: यह दोनों भौहों के बीच (कुटिया या तीसरा नेत्र स्थान) स्थित होता है, जो ज्ञान और मन के नियंत्रण का केंद्र है।
 इन छह चक्रों के अलावा सिर के ऊपरी हिस्से पर सातवां सहस्रार चक्र होता है, जिसे मिलाकर कुल सात मुख्य चक्र माने जाते हैं।
महत्व
  • ये चक्र हमारे सूक्ष्म शरीर और अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine Glands) से जुड़े ऊर्जा स्रोत हैं।
  • योग साधना में इन चक्रों के जागरण (षट्चक्र भेदन) को आध्यात्मिक उन्नति और कुंडलिनी शक्ति के विकास का मार्ग माना जाता है।

सात चक्रों को जागृत करने के लिए प्रत्येक चक्र के अलग-अलग बीज मंत्र होते हैं, जिन्हें क्रम से जपने पर शरीर के सातों ऊर्जा केंद्र सक्रिय होते हैं।

सातों चक्रों के बीज मंत्र
  • मूलाधार चक्र (Root Chakra): इसका बीज मंत्र ‘लं’ (Lam) है। यह रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में होता है।
  • स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra): इसका बीज मंत्र ‘वं’ (Vam) है। यह पेट के निचले हिस्से में स्थित होता है।
  • मणिपुर चक्र (Solar Plexus Chakra): इसका बीज मंत्र ‘रं’ (Ram) है। यह नाभि के पास स्थित होता है।
  • अनाहत चक्र (Heart Chakra): इसका बीज मंत्र ‘यं’ (Yam) है। यह हृदय के पास सीने के बीच में होता है।
  • विशुद्धि चक्र (Throat Chakra): इसका बीज मंत्र ‘हं’ (Ham) है। यह गले के पास स्थित होता है।
  • आज्ञा चक्र (Third Eye Chakra): इसका बीज मंत्र  ‘क्षं’ ( ksham ) है। यह दोनों भौहों के बीच में स्थित है ।
  • सहस्रार चक्र (Crown Chakra): इसका संबंध ‘मौन’ (Silence) या सर्वोच्च चेतना इसका बीज मंत्र ‘ॐ’ (Om / Aum) से है,     जो सिर के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित होता है।

    सहस्त्रार चक्र (Crown Chakra) का मूल बीज मंत्र ‘ॐ’ (AUM) है। कुछ परंपराओं में इसे मौन या ध्वनि से परे भी माना जाता है, क्योंकि यह सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है।

    सहस्त्रार चक्र से जुड़ी मुख्य बातें
    • स्थान: सिर के सबसे ऊपरी हिस्से (मस्तिष्क का शीर्ष भाग) पर।
    • रंग: बैंगनी (Violet) या सफेद।
    • महत्व: यह आध्यात्मिक जागरण, दिव्य ज्ञान और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने का केंद्र है।
छह मुख्य चक्रों  तथा सातवा सहस्त्रार के रंग, बीज मंत्र और देवता तथा षट्चक्र भेदन की प्रक्रिया और उसकी सावधानियां 
चक्रों के विवरण
चक्र का नाम रंग बीज मंत्र मुख्य देवता और शक्ति
मूलाधार लाल लं (Lam) भगवान गणेश / ब्रह्मा और देवी डाकिनी
स्वाधिष्ठान नारंगी (सिंदूरी) वं (Vam) भगवान विष्णु और देवी राकिनी
मणिपूर पीला रं (Ram) भगवान रुद्र (शिव) और देवी लाकिनी
अनाहत हरा यं (Yam) भगवान ईश (शिव) और देवी काकिनी
विशुद्ध नीला / बैंगनी हं (Ham) भगवान सदाशिव और देवी शाकिनी
आज्ञा

 

 

 

सहस्त्रार

 

गहरा नीला (इंडिगो)

श्वेत ऊर्जा का अनंत स्रोत

 

 

सत् चित्त आनंद

प्रकाश का अजस्त्र स्रोत्र भंडार

सहस्त्र कमल

क्षम् (ksham  )

 

 

ॐ om

 

 

 

 

 

 

भगवान शिव (शंभू) और देवी हाकिनी

 

परमपिता परमात्मा ईश्वर जो सृष्टि के कण कण में समाया हुआ हैं और ब्रह्मांड जिसमे समाया है, वही ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं

षट्चक्र भेदन की प्रक्रिया
षट्चक्र भेदन का अर्थ है मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) के निचले हिस्से में सुप्त पड़ी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर उसे सभी छह चक्रों से गुजारते हुए सिर के शीर्ष पर स्थित सहस्रार चक्र तक सहस्त्र कमल तक पहुंचाना है ।
इसकी सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
  1. आसन और प्राणायाम: साधक सिद्धासन या पद्मासन में बैठता है। नाड़ी शोधन और कुंभक प्राणायाम के जरिए शरीर की प्राण वायु (इड़ा और पिंगला नाड़ियों) को संतुलित किया जाता है।
  2. बंधों का प्रयोग: मूल बंध, उड्डियान बंध और जालंधर बंध (त्रिबंध) लगाकर प्राण ऊर्जा को नीचे की ओर जाने से रोका जाता है और उसे ‘सुषुम्ना नाड़ी’ की ओर मोड़ा जाता है।
  3. ध्यान और मंत्र जप: मूलाधार चक्र से शुरुआत करते हुए, प्रत्येक चक्र के स्थान पर ध्यान केंद्रित किया जाता है और उसके विशेष बीज मंत्र का मानसिक जप किया जाता है।
  4. ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन: जैसे-जैसे एकाग्रता बढ़ती है, कुंडलिनी ऊर्जा जागृत होकर एक-एक चक्र को भेदती (पार करती) हुई ऊपर उठती है और अंत में सहस्रार चक्र में विलीन हो जाती है।
अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानियां
षट्चक्र भेदन एक अत्यंत गहन और संवेदनशील आध्यात्मिक प्रक्रिया है कुंडलिनी जागरण की आधारभूत मूल प्रक्रिया है । इसमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है:
  • गुरु का मार्गदर्शन: इसे बिना समर्थ और अनुभवी गुरु के निर्देशन के चक्र भेदन करने से मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है या  रोग हो सकते हैं।
  • शारीरिक और मानसिक शुद्धि: चक्र जाग्रत करने से पहले यम, नियम, आसन और प्राणायाम द्वारा शरीर और नाड़ियों का शुद्ध होना जरूरी है। अशुद्ध शरीर में ऊर्जा का तीव्र प्रवाह नुकसान पहुंचा सकता है।
  • जल्दबाजी से बचें:  धैर्य रखें, यह कोई जादू नहीं है, बल्कि वर्षों का एकाग्र चित्त जटिल अभ्यास है। इसमें सहजता ही साधक को सफलता दिला सकती है, ज़बरदस्ती या तनावपूर्वक चक्रों पर ध्यान लगाने से सिरदर्द, अवसाद या तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में गड़बड़ी हो सकती है।
  • सात्विक जीवनशैली: अभ्यास के दौरान खान-पान आचार विचार व्यवहार पूरी तरह सात्विक और एकाग्र चित्त होना चाहिए और विचारों में पवित्रता होनी चाहिए।

By चंद्रशेखर

लेखक 50 से अधिक वर्षों से प्राचीन सनातन धर्म संस्कृति साहित्य, साधना पद्धतियों के शोधार्थी अध्येता संपादक विचारक चिंतक टीकाकार और मत प्रस्तोता हैं !

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *