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यज्ञ ( हवन ) सनातन  हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्राचीन पवित्र महत्वपूर्ण अनुष्ठान

यज्ञ (हवन) हिंदू धर्म का एक प्राचीन, पवित्र अनुष्ठान है, जिसमें अग्नि के माध्यम से देवताओं को आहुति (हविष्य) अर्पित की जाती हैहवन (यज्ञ या अग्निहोत्र) यह त्याग, समर्पण और परोपकार की भावना को दर्शाता है, जो वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ संपन्न होता है। यज्ञ का मुख्य उद्देश्य वायु शोधन, रोग निवारण, मानसिक शांति और लोक कल्याण माना जाता है। 

यज्ञ की प्रमुख विशेषताएँ:

  • अर्थ और उद्देश्य: यज्ञ का अर्थ है- त्याग, पूजन और दिव्य शक्तियों के प्रति समर्पण। यह स्वास्थ्यवर्धन और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक है।
  • प्रक्रिया: यज्ञ में वेदोक्त मंत्रों का उच्चारण करते हुए अग्नि कुण्ड में शुद्ध घी, जड़ी-बूटियों और खाद्य पदार्थों की आहुति दी जाती है।
  • वैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ: यज्ञ से वायुमंडल शुद्ध होता है और स्वास्थ्य में सुधार होता है। साथ ही, यह व्यक्ति को सात्विक और मानसिक रूप से शांत बनाता है।
  • पंच महायज्ञ: शास्त्रों में पांच प्रकार के नित्य यज्ञ बताए गए हैं- ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ, और अतिथि यज्ञ।
  • यज्ञ के प्रकार: मुख्य रूप से यज्ञ के तीन प्रकार हैं- सात्विक, राजसिक (धन और यश के लिए), और तामसिक (अज्ञानता या हिंसा से युक्त)।
  • यजमान: यज्ञ में जजमान (यजमान) वह व्यक्ति होता है जो इस अनुष्ठान को आयोजित करता है, जो परिवार के साथ या अकेले भी किया जा सकता है। 

यज्ञ को न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है, बल्कि यह परोपकार की एक ऐसी पद्धति है जो पर्यावरण संरक्षण (वायु शोधन) में भी मदद करती है। 

एक प्राचीन हिंदू अनुष्ठान है, जिसमें पवित्र अग्नि (अग्नि कुंड) में जड़ी-बूटियों, गाय के घी, और अनाज की आहुतियां देकर देवताओं का आह्वान किया जाता है। यह पर्यावरण को शुद्ध करने, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और वास्तु दोष दूर करने के लिए किया जाता है, जिसके अंत में “पूर्णाहुति” होती है। 

हवन की मुख्य सामग्री 

  • हवन कुंड: मिट्टी या धातु का बना।
  • समिटा (लकड़ी): आम, पीपल, या पलाश की लकड़ियां।
  • शुद्ध सामग्री: देसी गाय का घी, जौ (यव), काले/सफेद तिल, अक्षत (साबुत चावल), गुग्गुल, लोबान, कपूर, लौंग, और छोटी इलायची।
  • औषधियां: जटामासी, गिलोय, चंदन, और अन्य आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां।
  • अन्य: सूखे गोबर के उपले, फूल, और गंगाजल। 

हवन विधि (संक्षेप में) 

  1. कुंड तैयार करना: कुंड को धोकर उसमें स्वास्तिक बनाएं और उसे फूलों से सजाएं।
  2. अग्नि प्रज्वलन: कपूर और आम की लकड़ियों से अग्नि प्रज्वलित करें।
  3. संकल्प: अपना नाम और उद्देश्य (मनोकामना) का उच्चारण करें।
  4. शुद्धिकरण: अग्नि और स्वयं पर जल छिड़कें।
  5. आहुति (स्वाहा): घी की पांच आहुतियां “प्राणाय स्वाहा” आदि मंत्रों से दें। इसके बाद गणेश जी और नवग्रहों के मंत्रों के साथ सामग्री की आहुतियां दें।
  6. पूर्णाहुति: अंत में एक नारियल (कलावा लपेटकर) घी में डुबोकर आहुति दी जाती है।
  7. आरती: हवन के बाद भगवान की आरती करें और भस्म (विभूति) लगाएं। 

हवन के लाभ 

  • शुद्धिकरण: अग्नि और जड़ी-बूटियों के धुएं से घर का माहौल शुद्ध होता है और बैक्टीरिया, वायरस, फंगस नष्ट होते हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा: यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मानसिक शांति लाता है।
  • धार्मिक महत्व: इसे ग्रह दोष और वास्तु दोष दूर करने के लिए अचूक उपाय माना जाता है।

यज्ञ, कर्मकांड की विधि है जो परमात्मा द्वारा ही हृदय में सम्पन्न होती है। जीव के अपने सत्य परिचय जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव है, यज्ञ की पूर्णता है। यह शुद्ध होने की क्रिया है। इसका संबंध अग्नि से प्रतीक रूप में किया जाता है।

अधियज्ञोअहमेवात्र देहे देहभृताम वर ॥ 4/8 भगवत गीता
अनाश्रित: कर्म फलम कार्यम कर्म करोति य:
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: ॥ 1/6 भगवत गीता

शरीर या देह सेवा को छोड़ देने का वरण या निश्चय करने वालों में, यज्ञ अर्थात जीव और आत्मा की क्रिया या जीव का आत्मा में विलय, मुझ परमात्मा का कार्य है।

यज्ञ का अर्थ जबकि कर्मकांड है किन्तु इसकी शिक्षा व्यवस्था में अग्नि और घी के प्रतीकात्मक प्रयोग में पारंपरिक रूचि का कारण अग्नि के भोजन बनाने में, या आयुर्वेद और औषधीय विज्ञान द्वारा वायु शोधन इस अग्नि से होने वाले धुओं के गुण को यज्ञ समझ इस ‘यज्ञ’ शब्द के प्रचार प्रसार में बहुत सहायक रहे।

युधिष्ठिर मीमांसक आर्य समाज के मूर्धन्य विद्वानों में से एक हैं। उनकी कृतियों की गहनता व प्रामाणिकता आर्यसमाजी ही नहीं, अपितु सभी मान्यताओं के अध्येता मानते हैं । पिछले दिनों उनकी पुस्तक “श्रौतयज्ञों का संक्षिप्त परिचय” में यज्ञों के विषय में उन्होंने मत व्यक्त किया है कि सभी अग्निहोत्र केवल सृष्टि के क्रिया-कलापों के रूपक हैं और द्रव्ययज्ञ वस्तुतः वेदों में वर्णित नहीं हैं।

वैदिक कोश ‘निघण्टु’ में यज्ञ के 15 पर्यायों का उल्लेख है-
यज्ञः, वेनः, अध्वरः, मेध्ः, विदथः, नार्यः, सवनम्, होत्रा, इष्टिः, देवताता, मखः, विष्णुः, इन्दुः, प्रजापतिः, घर्म इति पञ्चदश यज्ञनामानि। 

अमरकोषकार ने सवः, यागः, सप्ततन्तुः एवं क्रतु को भी यज्ञ के पर्याय माना है। 

यज्ञः

वेदव्याख्याकार आचार्य यास्क ने ‘यज्ञ’ शब्द की निरुत्तिफ कई दृष्टियों से की है। यथा-

प्रख्यातं यजतिकर्म इति नैरुत्तफाः– निरुक्तकारों के मत में यज्ञ शब्द यजनार्थक है।

याज्चो भवतीति वा- अथवा यह किसी फल विशेष की याचना के लिये किया जाता है, यह यज्ञ याचनीय है।

यजुरुन्नो भवतीति वा-अथवा यजुर्मन्त्रों से सम्पन्न होता है, अतः इसे यज्ञ कहते हैं।

यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु इत्यस्माद्धतोः यजयाचेति सूत्रोण नघि प्रत्यये यज्ञशब्दो निष्पद्यते अर्थात् देवपूजा, संगतिकरण और दानात्मक धतु ‘यज्’ से नड्. प्रत्यय पूर्वक ‘यज्ञ’ शब्द सिद्ध होता है। इस कथन पर शतपथ ब्राह्मण भाष्यकार बुद्धदेव विद्यालंकार ने व्युत्पत्तियुत्तफ परिभाषा दी है- सामुदायिक योगक्याषेममुदिश्य समुदयादंग्त्य क्रियमाणं कर्म यज्ञ:- समुदाय का अंग बन कर समुदाय के योगक्षेम के लिये जो कार्य किये जाते हैं, वे यज्ञ कहलाते हैं।

अमरकोष के टीकाकार ने यज्ञ शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ किया है इज्यते असौ अनेन यत्रा वा- जो यजन किया जाये, जिसके द्वारा अथवा जहां यजन हो वही यज्ञ है।

यज्ञ-मीमांसाकार ने यज्ञ की विभिन्न निरुत्तिफयां की हैं। यथा-

इज्यन्ते (पूज्यन्ते) देवा अनेनेति यज्ञः। जिससे देवगण पूजे जाते हैं, वह यज्ञ है।

इज्यन्ते सम्पूजिताः तृप्तिमासाद्यन्ते देवा अत्रोति यज्ञः। जिस कार्य में देवगण पूजित होकर तृप्त हो, उसे यज्ञ कहते हैं।

येन सदनुष्ठानेन इन्द्रप्रभृतयो देवाः सुपर्सन्ना सुवृष्टिं कुर्युस्तद् यज्ञपदाभिध्यम्। जिस उत्तम अनुष्ठान से सूर्यादि देवगण अनुकूल वृष्टि करें, उसे यज्ञ कहते हैं।

येन सदनुष्ठानेन स्वर्गादिप्राप्तिः सुलभा स्यात् तद् यज्ञपदाभिधेयम्। जिस श्रेष्ठ अनुष्ठान से सुखविशिष्ट की प्राप्ति सहज हो जाये, वह यज्ञ है।

येन सदनुष्ठानेन सम्पूर्ण विश्वं कल्याणं भवेदाध्यात्मिकाध्-ि दैविकाध्भिौतिकतापत्रायोन्मूलनं सुकरं स्यात् तत् यज्ञपदाभिध्यम्। जिस सदनुष्ठान से सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो, आध्यात्मिक, आध्दिैविक, आध्भिौतिक तीनों तापों का उन्मूलन सरल हो जाये, उसे यज्ञ कहते हैं।

वेदमन्त्रौर्देवतामुदिश्य द्रव्यस्य दानं यागः। वेदमन्त्रों के द्वारा देवताओं को लक्ष्य कर द्रव्य का दान याग ;यज्ञद्ध है।

हिंदी विश्वकोष में संस्कृत ‘यज्ञ’ शब्द की निरुत्ति  दी गई है-

‘इज्यते हविर्दीयतेत्रा इज्यन्ते देवता अत्रा इति वा यागः’ जिसमें सभी देवताओं का पूजन हो अथवा घृतादि के द्वारा हवन हो, वह यज्ञ है।

वेनः

निरुत्तफ के टीकाकार देवराज यज्वा ने ‘वेन’ शब्द की निरुत्तिफ की है-
गच्छत्यनेन स्वर्गम्- इससे यजमान स्वर्ग को प्राप्त करता है।
प्रक्षिप्यते देवतोद्देशेन वास्मिन् हव्यम्– इसमें देवता के उद्देश्य से हवि दी जाती है।
तेनात्रा देवता काम्यन्ते वा– उस हवि से देवगण यहाँ बुलाये जाते हैं।

अध्वरः

संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में यज्ञ के ‘अध्वर’ नाम होने के अनेक कारण उल्लिखित हैं। यथा-
अध्वर्तव्या वा इमे देवाअभुव्न्नीति तदध्वरस्याध्वरत्वम्।।

 सभी देवगण यज्ञ के नायक होते हैं, इसलिये अध्वर का अध्वरत्व है।

तेsसूरा अपक्रांतब्रूवन्न वा इमे ध्वर्तवा अभवन्निती तदस्याध्वरत्वम्।

 वे असुर जाते हुए बोले कि यह यज्ञ हिंसित नहीं किये जा सकते यही यज्ञ का अध्वरत्व है।

देवान्ह वै यज्ञेन यजमानान्सपत्ना असुरा दुध्र्षाचक्रुः ते दुध्र्षन्त एव न शेकुधवितं ते पराबभूवुस्तस्माद्यज्ञो{ध्वरो नाम।।

 असुर लोग देवताओं और यजमानों की हिंसा करना चाहते थे, किन्तु वे उसमें सपफल नहीं हुए अपितु हार गये इसलिये यज्ञ का नाम ‘अध्वर’ हुआ है।

अध्वरो वै यज्ञः। यज्ञो वा अध्वरः। अध्वर ही यज्ञ है। यज्ञ ही अध्वर है।

आचार्य यास्क ने यज्ञ के पर्याय ‘अध्वर’ शब्द का निरुत्ति पूर्वक अर्थ दर्शाया है कि ‘‘अध्वर इति यज्ञनाम। ध्वरति हिंसाकर्मा तत्प्रतिषेध्ः।’’– अध्वर यज्ञ का नाम है। ध्वर, धतु हिंसार्थक है, वह जिसमें न हो वह यज्ञ ‘अध्वर’ कहलाता है।

अमरकोष टीकाकार की निरुत्तिफ है- ‘‘न ध्वरति अध्वानं राति वा’’ जो कुटिलता रहित है या जो मार्ग प्रदान करता है, वह अध्वर है।

ऋग्वेदभाष्य में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अध्वर का पदार्थ लिखा है- ‘हिंसा आदि दोषरहित। 

मेध्ः

निघण्टु- टीकायुत्तफ व्युत्पत्ति पूर्वक अर्थ है-
गच्छन्त्यत्रा देवता हविर्ग्रहीतुम्– जहाँ देवगण हवि ग्रहण करने के लिये जाते हैं।
दक्षिणार्थं वा सदस्यात्- जहाँ यजमान से दक्षिणा पाने विद्वद्गण जाते हैं।
हिनस्त्यनेन पापं वा- इससे पाप को विनष्ट किया जाता है।

आचार्य सायण ने मेध्र संगमे धतु से बने मेध् शब्द का अर्थ निरुत्तिफपूर्वक दिया है- मेध्यते देवैः संगम्यते इति मेध्ं हविः– देवों के द्वारा जो हवि ग्रहण की जाती है, वह यज्ञ मेध् है। मेध्ं हविर्यज्ञसम्बद्धम मेध्, हवि यज्ञ से संबद्द( है। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘मेध्’ शब्द का पदार्थ लिखा है-
‘ज्ञान और क्रिया से सिद्ध करने योग्य यज्ञ। यजुर्वेद में उन्होंने मेध् का अर्थ- ‘पवित्रम्’ किया है।

विदथः

धात्वर्थ  के अनुसार निरुक्त के टीकाकार की निरुक्ति है-

ज्ञायते हि यज्ञः- यज्ञ ही जानने योग्य है।
लभते हि दक्षिणादिरत्र- यहाँ दक्षिणा आदि प्राप्त की जाती है।
विचार्यते हि विद्वद्भिः- विद्वानों के द्वारा चिन्तन करने योग्य है।
भावयत्यनेन फलम्- इससे फल की प्राप्ति होती है।

नार्यः

‘नृ नये’ धतु से बने ‘नार्य’ शब्द का निरुक्ति  पूर्वक अर्थ है-

नयति स्वर्गं कर्तारम्- जो यज्ञ करने वाले को विशिष्ट सुख प्राप्त कराता है।

नीयतेयमनुष्ठानेन वा – यह अनुष्ठान से आगे बढ़ाया जाता है।

सवनम्

सायणाचार्य ने इसकी निम्न निरुक्ति की है-

सूयते सोमो एष्विति- जिसमें सोम टपकाया जाता है वह यज्ञ, ‘सवन’ है।जिसमें वेद मन्त्र गाये जाते हैं। 

होत्रा

यास्काचार्य ने होत्रा का भाष्य होतकर्म लिखा है, जिसका अर्थ है- यज्ञ

देवराज यज्वा ने निघण्टु की टीका में दीयतेस्मिन् हविः जिसमे हवि दी जाती है वह यज्ञ, होत्रा है। आचार्य वैद्यनाथ शास्त्राी ने वर्षारूपी यज्ञ अर्थ किया है। 

स्वामी दयानन्दकृत अर्थ है- ‘जिसमें सब सुखो को सिद्ध करते हैं।’ जिसमे हवि दी जाती है वह यज्ञ, होत्रा है।
निघण्टु के टीकाकार कृत् अर्थ- अभिपूयतेsस्मिन् स्तोमः।

इष्टिः

ब्राह्मण ग्रन्थ में इष्टि के इष्टित्व पर प्रकाश डालते हुए उसे ऐश्वर्यप्राप्ति (इन्द्रत्व) का साधन कहा गया है। यथा- तम् (इन्द्रं देवा) इष्टिभिरन्विच्छन् तमिष्टिभिरन्वविन्दन् तदिष्टीनामिष्टिन्वम्।।

देवताओं ने उस इन्द्र को इष्टियों के द्वारा पाने की इच्छा से यज्ञों के द्वारा पा लिया यही इष्टियों का इष्टित्व है।

सायणभाष्य में इष्टये यजतेर्भावे क्तिनि सम्प्रसारणम् धतु-प्रत्यय से बने इष्टि शब्द की निरुक्ति दी गई है इष्टयः एष्टव्या भोगाः
सर्वपफलसाध्का यागा वा सन्ति– समस्त भोग्य फलों को सिद्ध करने वाला यज्ञ इष्टि है।

निघण्टु-टीकाकार कृत निरुक्ति – यजतेर्यज्ञवदर्थः– यज्ञ के समान यजन किया जाता है अथवा इष्यते हि सः– वह कामना करने योग्य है।

देवताता

ऋग्वेद के अग्निसूत्तफ में स्पष्टतया ‘देवताता’ शब्द से ‘यज्ञ’ लक्षित है। यथा- आ देवताता हविषा विवासति।।

आचार्य सायण ने धतु-प्रत्यय पूर्वक चिन्तन प्रस्तुत किया है कि
पाणिनिसूत्रा सर्व देवात्तातिल् इति स्वार्थिकः से देवताता शब्द सिद्ध होता है, देवताता इति यज्ञनाम– देवताता यह यज्ञ का नाम है क्योंकि
यज्ञ में चरूपुरोडाश आदि आहुति से देवों की सेवा की जाती है।

अन्यत्रा उन्होंने कई प्रकार की निरुत्तियां दी हैं-

देवेन तता देवताता– देवता के द्वारा विस्तारित यज्ञ, देवताता है।
देवनशीलनाग्निना विस्तारिता दीप्तिः- देवनशील अग्नि के द्वारा विस्तारित आभा, देवताता है।
विस्तारयुत्तफाय यागाय- देवों के विस्तारयुत्तफ यज्ञ के लिये यजमानअग्नि की सेवा करते हैं उसे देवताता कहते हैं। 
निघण्टु- टीकाकार की निरुत्तिफ है- दीव्यन्ति स्तुवन्त्यत्रा देवताः- जहां देवताओं की स्तुति की जाती है वह यज्ञ, देवताता है।

मखः

संहिता ग्रन्थों के अनुसार यज्ञो वै मखः– यज्ञ ही मख है। 
मख इति एतद्यज्ञनामधयेम, छिद्रप्रतिषध्सामर्थ्यात, छिद्र खमित्युत्तफं- तस्य मेति प्रतिषेध्ः। मा यज्ञं छिद्रं करिष्यतीति।। 
मख यह यज्ञ का नाम है क्योंकि मख दोषनिवारक है अथवा छिद्ररहित (निर्दोष) है। छिद्र को खम् कहते हैं उसका प्रतिषेध् मख
कहलाता है। यज्ञ को दूषित नहीं किया जाना चाहिए।

ऋग्वेद में पठित मख शब्द पर आचार्य सायण ने अपने भाष्य में लिखा है- मखः प्रवर्तमानोsयं यज्ञः- किया जा रहा यह यज्ञ।

अयं यज्ञो मरुत इन्द्रं चातिशयेन प्रणीयतीत्यर्थः- यह यज्ञ वायु और सूर्य आदि को उत्कृष्टतया प्रसन्न करता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘मख’ का पदार्थ दिया है- ‘सुख और पालन होने के हेतु यज्ञ।’ उन्होंने चिन्तन पूर्वक मख को शुद्धिकारक कहा है। यथा-

जो शुद्ध अतिउत्तम पदार्थों से अग्नि में किये हुए होम से सिद्ध किया हुआ यज्ञ है, वह वायु और सूर्य की किरणों की शुद्धि के द्वारा रोगनाश करने के हेतु से सब जीवों को सुख देकर बलवान् करता है।
निघण्टु के टीकाकार ने मह पूजायाम् धातु मानकर इसकी निरुक्ति की है- महन्त्यत्र देवताः- यहाँ देवता पूजे जाते हैं। 
अमरकोष के व्याख्याकार ने मख गतौ धतु से बने मख शब्द की निरुक्ति  की है- मखन्ति देवा अत्र अनेन वा- देवता जहां जाते हैं अथवा जिससे गतिशील होते हैं वह मख ‘यज्ञ’ है। 

हिन्दी विश्वकोष में भी यही निरुक्ति दी गई है। 

विष्णुः

संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में यज्ञ को ‘विष्णु’ कहा गया है। यज्ञो विष्णुः, विष्णुर्यज्ञः, यज्ञो वै विष्णुः।। 
विशेषेणाप्नोति स्वर्गं- जिसके द्वारा सुख विशेष की प्राप्ति हो, वह यज्ञ विष्णु है। 

इन्दुः

उन्दी क्लेदने धातु से निर्मित इन्दु शब्द का व्युत्पत्ति पूर्वक अर्थ है- क्लिद्यते सूयतेsस्मिन् सोमः- जिसमें सोम टपकाया जाता है वह यज्ञ इन्दु है। 

भाषाभाष्यकार ने इन्दु शब्द का अर्थ जलक्रियामय यज्ञ किया है। 

प्रजापतिः

अनेकार्थवाची शब्द प्रजापति, यज्ञ का भी नाम है। संहिता एवं ब्राह्मण-ग्रन्थों में उल्लिखित है- यज्ञ उ वै प्रजापतिः।
यज्ञो वै प्रजापतिः   ; एष वै प्रत्यक्षं यज्ञो यत्प्रजापतिः।। यह यज्ञ ही ‘प्रजापति’ है।
निघण्टु- व्याख्याकार ने प्रजापति शब्द को- ‘वृष्ट्यादि हेतुत्वात्- वृष्टि का हेतु’ लिखकर यज्ञपरक माना है।
भाषाभाष्यकार ने ‘प्रजा का पालक- अग्नि अर्थ किया है। 

घर्मः

काठक संहिता में अग्निहोत्र को घर्म कहा गया है। यथा- घर्मो व एष प्रवृज्यते यदग्निहोत्रम्। 
ऋग्वेद में आये घर्म शब्द का अर्थ यज्ञ करते हुए आचार्य सायण ने लिखा है क्रव्यादात्परोग्निर उत्कृष्ट  सहस्थाने यज्ञ प्राप्नोतु- मृत शरीर को जलाने वाली क्रव्याद- अग्नि से भिन्न गृह में स्थापित अग्नि विस्तृत यज्ञ गृह में यज्ञ को प्राप्त करें।
निघण्टु टीका में क्षरत्यस्मिन् सोमः दीप्यतेsत्राग्नयः वा- जिसमें सोम की आहुति दी जाती है अथवा जहाँ अग्नियां प्रज्वलित होती हैं वह
यज्ञ ‘घर्म’ उल्लिखित है। 

सवः

सूयते सोमोsत्र- जहां सोम का अभिषव किया जाता है वह ‘सव’ है।

यागः

इज्यते अनेन वा यत्र वा-जहाँ या जिससे पूजन कर्म हो वह ‘याग’ है।

सप्ततन्तुः

सप्तभिस्छन्दोभिरग्निर्जिहवाभिर्वा तन्यते यद्वा तानि सप्त तन्यन्तेsत्र- सात छन्दों के द्वारा अथवा अग्नि की सात ज्वालाओं के द्वारा विस्तारित यज्ञ ‘सप्ततन्तु’ है या जहां वे सातों विस्तृत हों। 

क्रतुः

करोति क्रियते वा- जो किया या कराया जाता है वह यज्ञ क्रतु है। 

यज्ञ 

संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- “आहुति, चढ़ावा”। यह हिंदू धर्म में प्राचीन भारत के आरंभिक ग्रंथों वेदों में निर्धारित अनुष्ठानों पर आधारित उपासना पद्धति है। यह उपासना उस पूजा के विपरीत है, जिसमें अवैदिक मूर्तिपूजा एवं भक्ति प्रथाएँ शामिल हो सकती हैं। यज्ञ हमेशा उद्देश्यपूर्ण होता है। यहाँ तक कि इसका लक्ष्य ब्रह्मांड की स्वाभाविक व्यवस्था क़ायम रखने जैसा व्यापक भी हो सकता है। इसमें अनुष्ठानों का सही निष्पादन और मंत्रों का शुद्ध उच्चारण अनिवार्य माने जाते हैं तथा निष्पादक और प्रयुक्त सामग्री का अत्यधिक पवित्र होना आवश्यक है। ऐसी आनुष्ठानिक आवश्यकताओं ने पुरोहितों के व्यावसायिक वर्ग, आधुनिक ब्राह्मणों को जन्म दिया, जिनकी अब भी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक यज्ञ कराने में आवश्यकता पड़ती है। कई रूढ़िवादी पारंपरिक कुलीन सनातन हिन्दू परिवार पाँच दैनिक घरेलू आहुतियाँ और अग्निहोत्र  महायज्ञ अब भी करते हैं।

  • 1 यज्ञ के अंग तथा प्रकार
  • 2 तात्पर्य
  • 3 अश्वमेध यज्ञ
  • 4 राजसूय यज्ञ
  • 5 गृहस्थ धर्म के यज्ञ
  • 6 पौराणिक महत्त्व
  • 7 यज्ञ की महिमा
  •  

यज्ञ के अंग तथा प्रकार

यज्ञ के चार अंग माने गए हैं- ‘स्नान’, ‘दान’, ‘होम’ तथा ‘जप’।

इसके पाँच प्रकार बताये गए हैं-

  1. लोक
  2. क्रिया
  3. सनातन गृह
  4. पंचभूत
  5. मनुष्य

तात्पर्य

यज्ञ से तात्पर्य है- ‘त्याग, बलिदान, शुभ कर्म’। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयत्न से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है। वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है। यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है। गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें।

अश्वमेध यज्ञ

 अश्वमेध यज्ञ

अश्वमेध मुख्यत: राजनीतिक यज्ञ था और इसे वही सम्राट कर सकता था, जिसका अधिपत्य अन्य सभी नरेश मानते थे। ‘आपस्तम्ब:’ में लिखा है

“राजा सार्वभौम: अश्वमेधेन यजेत्। नाप्यसार्वभौम:”

अर्थात “सार्वभौम राजा अश्वमेध करे असार्वभौम कदापि नहीं।” यह यज्ञ उसकी विस्तृत विजयों, सम्पूर्ण अभिलाषाओं की पूर्ति एवं शक्ति तथा साम्राज्य की वृद्धि का द्योतक होता था।

राजसूय यज्ञ

 राजसूय यज्ञ

ऐतरेय ब्राह्मण इस यज्ञ के करने वाले महाराजाओं की सूची प्रस्तुत करता है, जिन्होंने अपने राज्यारोहण के पश्चात् पृथ्वी को जीता एवं इस यज्ञ को किया। इस प्रकार यह यज्ञ सम्राट का प्रमुख कर्तव्य समझा जाने लगा। जनता इसमें भाग लेने लगी एवं इसका पक्ष धार्मिक की अपेक्षा अधिक सामाजिक होता गया। यह यज्ञ चक्रवर्ती राजा बनने के लिए किया जाता था।

गृहस्थ धर्म के यज्ञ

हिन्दू धर्म-ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ हिन्दू को पाँच यज्ञों को अवश्य करना चाहिए-

  1. ब्रह्म-यज्ञ – प्रतिदिन अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है।

  2. देव-यज्ञ – देवताओं की प्रसन्नता हेतु पूजन-हवन आदि करना।

  3. पितृ-यज्ञ – ‘श्राद्ध’ और ‘तर्पण’ करना ही पितृ-यज्ञ है।

  4. भूत-यज्ञ – ‘बलि’ और ‘वैश्व देव’ की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे ‘भूत-यज्ञ’ कहते हैं तथा,

  5. मनुष्य-यज्ञ – इसके अन्तर्गत ‘अतिथि-सत्कार’ आता है।

उक्त पाँचों यज्ञों को नित्य करने का निर्देश है।

ब्रह्मयज्ञ

ब्रह्मयज्ञ में गायत्री विनियोग होता है। मरणोत्तर संस्कार के संदर्भ में एकत्रित सभी कुटुम्बी-हितैषी परिजन एक साथ बैठें। मृतात्मा के स्नेह-उपकारों का स्मरण करें। उसकी शान्ति-सद्गति की कामना व्यक्त करते हुए सभी लोग भावनापूवर्क पाँच मिनट गायत्री मन्त्र का मानसिक जप करें, अन्त में अपने जप का पुण्य मृतात्मा के कल्याणार्थ अपिर्त करने का भाव करें- यह न्यूनतम है। यदि सम्भव हो, तो शुद्धि दिवस के बाद त्रयोदशी तक भावनाशील परिजन मिल-जुलकर गायत्री जप का एक लघु अनुष्ठान पूरा कर लें। ब्रह्ययज्ञ को उसकी पूणार्हुति मानें। संकल्प बोलें:-

नामाहं…
नाम्नः प्रेतत्वनिवृत्तिद्वारा, ब्रह्मलोकावाप्तये…
परिमाणं गायत्री
महामन्त्रानुष्ठानपुण्यं श्रद्धापूवर्कम् अहं समपर्यिष्ये।

देवयज्ञ

देवयज्ञ में देवप्रवृत्तियों का पोषण किया जाए। दुष्प्रवृत्तियों के त्याग और सत्प्रवृत्तियों के अभ्यास का उपक्रम अपनाने से देवशक्तियाँ तुष्ट होती हैं, देववृत्तियाँ पुष्ट होती हैं। श्राद्ध के समय संस्कार करने वाले प्रमुख परिजन सहित उपस्थित सभी परिजनों को इस यज्ञ में यथाशक्ति भाग लेना चाहिए। अपने स्वभाव के साथ जुड़ी दुष्प्रवृत्तियों को सदैव के लिए या किसी अवधि तक के लिए छोड़ने, परमार्थ गतिविधियों को अपनाने का संकल्प कर लिया जाए, उसका पुण्य मृतात्मा के हितार्थ अपिर्त किया जाए। संकल्प बोलें:-

नामाहं…
नामकमृतात्मनः देवगतिप्रदानाथर्…
दिनानि यावत् मासपयर्न्तं-वषर्पयर्न्तं…
दुष्प्रवृत्त्युन्मूलनैः …
सत्प्रवृत्तिसंधारणैः जायमानं पुण्यं मृतात्मनः समुत्कषर्णाय श्रद्धापूवर्कं अहं समपर्यिष्ये।

पितृयज्ञ

यह कृत्य पितृयज्ञ के अंतगर्त किया जाता है। जिस प्रकार तर्पण में जल के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त की जाती है, उसी प्रकार हविष्यान्न के माध्यम से अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति की जानी चाहिए। मरणोत्तर संस्कार में 12 पिण्डदान किये जाते हैं- जौ या गेहूँ के आटे में तिल, शहद, घृत, दूध मिलाकर लगभग एक-एक छटाँक आटे के पिण्ड बनाकर एक पत्तल पर रख लेने चाहिए। संकल्प के बाद एक-एक करके यह पिण्ड जिस पर रखे जा सकें, ऐसी एक पत्तल समीप ही रख लेनी चाहिए। छह तर्पण जिनके लिए किये गये थे, उनमें से प्रत्येक वर्ग के लिए एक-एक पिण्ड है। सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के लिए है। अन्य पाँच पिण्ड उन मृतात्माओं के लिए हैं, जो पुत्रादि रहित हैं, अग्निदग्ध हैं, इस या किसी जन्म के बन्धु हैं, उच्छिन्न कुल, वंश वाले हैं, उन सबके निमित्त ये पाँच पिण्ड समपिर्त हैं। ये बारहों पिण्ड पक्षियों के लिए अथवा गाय के लिए किसी उपयुक्त स्थान पर रख दिये जाते हैं। मछलियों को चुगाये जा सकते हैं। पिण्ड रखने के निमित्त कुश बिछाते हुए निम्न मन्त्र बोलें:-

ॐ कुशोऽसि कुश पुत्रोऽसि, ब्रह्मणा निमिर्तः पुरा।
त्वय्यचिर्तेऽ चिर्तः सोऽ स्तु, यस्याहं नाम कीतर्ये।

मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है। काया की समाप्ति के बाद भी जीव यात्रा रुकती नहीं है। आगे का क्रम भी भलीप्रकार सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणोत्तर संस्कार किया जाता है। सूक्ष्म विद्युत तरंगों के माध्यम से वैज्ञानिक दूरस्थ उपकरण का संचालन कर लेते हैं। श्रद्धा उससे भी अधिक सशक्त तरंगें प्रेषित कर सकती है। उसके माध्यम से पितरों-को स्नेही परिजनों की जीव चेतना को दिशा और शक्ति तुष्टि प्रदान की जा सकती है। मरणोत्तर संस्कार द्वारा अपनी इसी क्षमता के प्रयोग से पितरों की सद्गति देने और उनके आशीर्वाद पाने का क्रम चलाया जाता है। पितृ-यज्ञ हेतु मनीषियों ने हमारे यहाँ आश्विन या कुआर के कृष्ण-पक्ष के पूरे पन्द्रह दिन (मतान्तर से 16 दिन) विशेष रूप से सुरक्षित किए हैं। इस पूजा के लिए कुछ मुख्य बातें इस प्रकार है-

  विधि
(क) पितृ-पक्ष के दिनों में अपने स्वर्गीय पिता, पितामह, प्रपितामह तथा वृद्ध प्रपितामह और स्वर्गीय माता, मातामह, प्रमातामह एवं वृद्ध-प्रमातामह के नाम-गोत्र का उच्चारण करते हुए अपने हाथों की अञ्जुली से जल प्रदान करना चाहिए (यदि किसी कारण-वश किसी पीढ़ी के पितर का नाम ज्ञात न हो सके, तो भावना से स्मरण कर जल देना चाहिए)।
(ख) पितरों को जल देने के लिए विशेष वस्तुओं के प्रबन्ध की आवश्यकता नहीं है। केवल 1- कुश, 2- काले तिल, 3- अक्षत (चावल), 4- गंगा-जल और 5- श्वेत-पुष्प पर्याप्त हैं। इन्हीं से श्रद्धा-पूर्वक जल प्रदान से पितर अल्प समय में सन्तुष्ट हो जाते हैं और कल्याण हेतु आशीर्वाद देते हैं।
(ग) स्कन्द-महा-पुराण’ में भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं कि – ‘हे महादेवि ! जो ‘श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा को मैं ग्रहण नहीं करता। भगवान हरि भी नहीं ग्रहण करते हैं।
(घ) यदि किसी को किसी कारण-वश माता-पिता की मृत्यु-तिथि का ज्ञान न हो, तो उसे ‘अमावस्या’ को ही वार्षिक-श्राद्ध करना चाहिए।
(ङ) श्राद्ध-कर्त्ता को केवल एक समय भोजन करना चाहिए अर्थात रात्रि को भोजन नहीं करना चाहिए। श्राद्ध के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

भूतयज्ञ-पञ्चबलि

भूतयज्ञ के निमित्त पञ्चबलि प्रक्रिया की जाती है। विभिन्न योनियों में संव्याप्त जीव चेतना की तुष्टि हेतु भूतयज्ञ किया जाता है। अलग-अलग पत्तों या एक ही बड़ी पत्तल पर, पाँच स्थानों पर भोज्य पदार्थ रखे जाते हैं। उरद-दाल की टिकिया तथा दही इसके लिए रखा जाता है। पाँचों भाग रखें। क्रमशः मन्त्र बोलते हुए एक-एक भाग पर अक्षत छोड़कर बलि समपिर्त करें।

  1. गोबलि– पवित्रता की प्रतीक गऊ के निमित्त- ॐ सौरभेय्यः सवर्हिताः, पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्णन्तु में ग्रासं, गावस्त्रैलोक्यमातरः॥ इदं गोभ्यः इदं न मम।
  2. कुक्कुरबलि– कत्तर्व्यनिष्ठा के प्रतीक श्वान के निमित्त- ॐ द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ, वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि, स्यातामेतावहिंसकौ॥ इदं श्वभ्यां इदं न मम॥
  3. काकबलि– मलीनता निवारक काक के निमित्त- ॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या, याम्या वै नैऋर्तास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्णन्तु, भमौ पिण्डं मयोज्झतिम्। इदं वायसेभ्यः इदं न मम॥
  4. देवबलि– देवत्व संवधर्क शक्तियों के निमित्त- ॐ देवाः मनुष्याः पशवो वयांसि, सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता, ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्॥ इदं अन्नं देवादिभ्यः इदं न मम।
  5. पिपीलिकादिबलि– श्रमनिष्ठा एवं सामूहिकता की प्रतीक चींटियों के निमित्त- ॐ पिपीलिकाः कीटपतंगकाद्याः, बुभुक्षिताः कमर्निबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यथर्मिदं मयान्नं, तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥ इदं अन्नं पिपीलिकादिभ्यः इदं न मम। बाद में गोबलि गऊ को, कुक्कुरबलि श्वान को, काकबलि पक्षियों को, देवबलि कन्या को तथा पिपीलिकादिबलि चींटी आदि को खिला दिया जाए।

मनुष्ययज्ञ-श्राद्ध संकल्प

इसके अन्तगर्त दान का विधान है। दिवंगत आत्मा ने उत्तराधिकार में जो छोड़ा है, उसमें से उतना अंश ही स्वीकार करना चाहिए, जो पीछे वाले बिना कमाऊ बालकों या स्त्रियों के निवार्ह के लिए अनिवार्य हो-कमाऊ सन्तान को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। दिवंगत आत्मा के अन्य अहसान ही इतने हैं कि उन्हें अनेक जन्मों तक चुकाना पड़ेगा, फिर नया ऋण भारी ब्याज सहित चुकाने के लिए क्यों सिर पर लादा जाए। असमर्थ स्थिति में अभिभावकों की सेवा स्वीकार करना उचित था, पर जब वयस्क और कमाऊ हो गये, तो फिर उसे लेकर ‘हराम-खाऊ’ मुफ़्तखोरों में अपनी गणना क्यों कराई जाए? पूवर्जों के छोड़े हुए धन में कुछ अपनी ओर से श्रद्धाञ्जलि मिलाकर उनकी आत्मा के कल्याण के लिए दान कर देना चाहिए, यही सच्चा श्राद्ध है। पानी का तर्पण और आटे की गोली का पिण्डदान पयार्प्त नहीं, वह क्रिया कृत्य तो मात्र प्रतीक हैं। श्रद्धा की वास्तविक परीक्षा उस श्राद्ध में है कि पूवर्जों की कमाई को उन्हीं की सद्गति के लिए, सत्कर्मो के लिए दान रूप में समाज को वापस कर दिया जाए। अपनी कमाई का जो सदुपयोग, मोह या लोभवश स्वर्गीय आत्मा नहीं कर सकी थी, उस कमी की पूर्ति उसके उत्तराधिकारियों को कर देनी चाहिए।

प्राचीनकाल में ब्राह्मण का व्यक्तित्व एक समग्र संस्था का प्रतिरूप था। उन्हें जो दिया जाता था, उसमें से न्यूनतम निवार्ह लेकर शेष को समाज की सत्प्रवृत्तियों में खर्च करते थे। अपना निवार्ह भी इसलिए लेते थे कि उन्हें निरन्तर परमार्थ प्रयोजनों में ही लगा रहना पड़ता था। आज वैसे ब्राह्मण नहीं है, इसलिए उनका ब्रह्मभोज भी साँप के चले जाने पर लकीर पीटने की तरह है। दोस्तों-रिश्तेदारों को मृत्यु के उपलक्ष्य में दावत खिलाना मूखर्ता और उनका खाना निलर्ज्ज्ता है, इसलिए मृतकभोज की विडम्बना में न फँसकर श्राद्धधन परमार्थ प्रयोजन के लिए लगा देना चाहिए, जिससे जनमानस में सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो और वे कल्याणकारी सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करें, यही सच्चा श्राद्ध है। कन्या भोजन, दीन-अपाहिज, अनाथों को ज़रूरत की चीज़ें देना, इस प्रक्रिया के प्रतीकात्मक उपचार हैं।

इसके लिए तथा लोक हितकारी पारमाथिर्क कार्यो ( वृक्षारोपण, विद्यालय निर्माण) के लिए दिये जाने वाले दान की घोषणा श्राद्ध संकल्प के साथ की जानी चाहिए।

।।संकल्प॥

नामाहं…
नामकमृतात्मनः शान्ति-सद्गति-निमित्तं लोकोपयोगिकायार्थर्…
परिमाणे धनदानस्य कन्याभोजनस्य वा श्रद्धापूवर्कं संकल्पम् अहं करिष्ये॥
संकल्प के बाद निम्न मन्त्र बोलते हुए अक्षत-पुष्प देव वेदी पर चढ़ाएँ।
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमहि, उशन्तः समिधीमहि।
उशन्नुशतऽ आ वह, पितृन्हविषेऽअत्तवे॥
ॐ दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वाऽवतु बृहत्साम, पञ्चदशस्तोमो ग्रीष्मऽऋतुः क्षत्रं द्रविणम्॥

पञ्चयज्ञ पूरे करने के बाद अग्नि स्थापना करके गायत्री-यज्ञ सम्पन्न करें, फिर लिखे मन्त्र से 3 विशेष आहुतियाँ दें।

ॐ सूयर्पुत्राय विद्महे, महाकालाय धीमहि।
तन्नो यमः प्रचोदयात् स्वाहा।
इदं यमाय इदं न मम॥

इसके बाद स्विष्टकृत – पूणार्हुति आदि करते हुए समापन करें। विसजर्न के पूर्व पितरों तथा देवशक्तियों के लिए भोज्य पदार्थ थाली में सजाकर नैवेद्य अपिर्त करें, फिर क्रमशः क्षमा-प्राथर्ना, पिण्ड विसजर्न, पितृ विसजर्न तथा देव विसजर्न करें।

पौराणिक महत्त्व

वैदिक यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह महाक्रतुओं में से एक है।

  • ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित दो मन्त्र हैं।
  • शतपथ ब्राह्मण में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है।
  • तैत्तिरीय ब्राह्मण,
  • कात्यायनीय श्रोतसूत्र,
  • आपस्तम्ब:,
  • आश्वलायन,
  • शंखायन तथा दूसरे समान ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त होता है।
  • महाभारत में महाराज युधिष्ठिर द्वारा कौरवौं पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् पाप मोचनार्थ किये गये अश्वमेध यज्ञ का विशद वर्णन है।

यज्ञ की महिमा

  • ब्रह्म वैवर्त पुराण में सावित्री और यमराज संवाद में वर्णन आया-
  • भारत-जैसे पुण्यक्षेत्र में जो अश्वमेध यज्ञ करता है, वह दीर्घकाल तक इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है।
  • राजसूय यज्ञ करने से मनुष्य को इससे चौगुना फल मिलता है।
  • सम्पूर्ण यज्ञों से भगवान विष्णु का यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है।
  • ब्रह्मा ने पूर्वकाल में बड़े समारोह के साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उसी यज्ञ में दक्ष प्रजापति और शंकर में कलह मच गया था। ब्राह्मणों ने क्रोध में आकर नन्दी को शाप दिया था और नन्दी ने ब्राह्मणों को। यही कारण है कि भगवान शंकर ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर डाला।
  • पूर्वकाल में दक्ष, धर्म, कश्यप, शेषनाग, कर्दममुनि, स्वायम्भुव मनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुव ने विष्णुयज्ञ किया था। उसके अनुष्ठान से हज़ारों राजसूय यज्ञों का फल निश्चित रूप से मिल जाता है। वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पों तक जीवन धारण करने वाला तथा जीवन्मुक्त होता है।
  • जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, वैष्णव पुरुषों में शिव, शास्त्रों में वेद, वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में गंगा, पुण्यात्मा पुरुषों में वैष्णव, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड़, स्त्रियों में भगवती मूल प्रकृति राधा, आधारों में वसुन्धरा, चंचल स्वभाववाली इन्दियों में मन, प्रजापतियों में ब्रह्मा, प्रजेश्वरों में प्रजापति, वनों में वृन्दावन, वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमानों में लक्ष्मी, विद्वानों में सरस्वती देवी, पतिव्रताओं में भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्ण पत्नियों में श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में ‘विष्णु यज्ञ’ श्रेष्ठ माना जाता है।

अर्थ

यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं- 

– देवपूजा,

-दान,

३-संगतिकरण।

संगतिकरण का अर्थ है-संगठन

यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत्प्रयोजन के लिए संगठित करना भी है। इस युग में संघ शक्ति ही सबसे प्रमुख है। परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी पृथक्-पृथक् शक्तियों का एकीकरण करके संघ-शक्ति के रूप में दुर्गा शक्ति का प्रादुर्भाव किया था। उस माध्यम से उसके दिन फिरे और संकट दूर हुए। मानवजाति की समस्या का हल सामूहिक शक्ति एवं संघबद्धता पर निर्भर है, एकाकी-व्यक्तिवादी-असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते हैं। गायत्री यज्ञों का वास्तविक लाभ सार्वजनिक रूप से, जन सहयोग से सम्पन्न कराने पर ही उपलब्ध होता है।

यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, समर्पण शुभ कर्म।

अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ् वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयतन से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है।  वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है। यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है। गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें।

यज्ञ की विधि

अग्नि को पावक कहते हैं क्योंकि यह अशुद्धि को दूर करती है। लोहे के अयस्क को उच्च ताप देने पर लोहा पिघल कर निकलता है। यह क्रिया भी लोहे का यज्ञ है। पारंपरिक विधि में यज्ञ की इस विधि को प्रतीकों से समझाया जाता रहा है। कुछ लोग उस अग्नि क्रिया को गलती से यज्ञ मान लेते हैं।

अग्नि में दूध के छींटे पडने से अग्नि बुझने लगती है। अग्नि और दूध के जल का यह प्रतीकात्मक प्रयोग सिर्फ यह ज्ञान देता है कि मनुष्य के अनियंत्रित विचार या अनुभव, संसार में अर्थहीन हैं और वह प्राकृतिक सिद्धांतों द्वारा नहीं फैल सकता। कोई भी अनुभव सर्व व्यापी नहीं होता। कोई व्यक्ति जो दुखी है वह अपने दुख के अनुभव को कैसे व्यक्त कर सकता है? और यदि वह अपनी बात कहता भी है या रोता बिलखता है, तो भी कोई दूसरा व्यक्ति उस दुख को नहीं समझ सकता।

दूध को मथने से उसका जल और घी अलग अलग हो जाते हैं। अब उसी अग्नि में घी डाला जाता है, जिस से अग्नि उसे प्रकाश में परिवर्तित कर देती है।। अग्नि और घी का यह प्रतीकात्मक प्रयोग सिर्फ यह ज्ञान देता है कि जब ज्ञान को उसी अग्नि रूपी सत्य में डाल दिया जाता है तब इस कर्म का प्रभाव अलग हो जाता है और अग्नि उस ज्ञान को संसार में प्रकाशित हो अंधकार को दूर करती है।

मुदिता मथइ, विचार मथानी। दम आधार, रज्जु सत्य सुबानी।

तब मथ काढ़ि, लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥ 116.8 ॥

उत्तरकाण्ड

बिमल ज्ञान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छायी ॥ 121.6 ॥

उत्तरकांड

प्रसन्नता के साथ, सांसरिक विचारों को मथ कर उसे शुद्ध करने की क्रिया, इंद्रियों के संयम को खंबे की तरह खड़ा कर, सत्य और वाणी के रस्सी द्वारा की जाती है। दूध अर्थात संसार के विचार के इसी तरह मथने से घी निकाला जाता है, जिसमें मल अर्थात अशुद्धि नहीं होती और उसमें उत्सर्ग या वैराग्य होता है और वह सुंदर और पवित्र है। जो भी उस निर्मल या मल रहित, ज्ञान से स्नान करता है, उसके हृदय में श्री राम की भक्ति, अपने आप परिछायी की तरह आ जाती है।

दूध, घी और अग्नि और प्रकाश, क्रमशः अनुभव और ज्ञान और विवेक और सत्य हैं और यज्ञ उनका एक सामंजस्य है।

यदि यज्ञ भावना के साथ मनुष्य ने अपने को जोड़ा न होता, तो अपनी शारीरिक असमर्थता और दुर्बलता के कारण अन्य पशुओं की प्रतियोगिता में यह कब का अपना अस्तित्व खो बैठा होता। यह जितना भी अब तक बढ़ा है, उसमें उसकी यज्ञ भावना ही एक मात्र माध्यम है। आगे भी यदि प्रगति करनी हो, तो उसका आधार यही भावना होगी।

प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परंपरा के अनुरूप है। समुद्र बादलों को उदारतापूर्वक जल देता है, बादल एक स्थान से दूसरे स्थान तक उसे ढोकर ले जाने और बरसाने का श्रम वहन करते हैं। नदी, नाले प्रवाहित होकर भूमि को सींचते और प्राणियों की प्यास बुझाते हैं। वृक्ष एवं वनस्पतियाँ अपने अस्तित्व का लाभ दूसरों को ही देते हैं। पुष्प और फल दूसरे के लिए ही जीते हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदि की क्रियाशीलता उनके अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् दूसरों के लिए ही है। शरीर का प्रत्येक अवयव अपने निज के लिए नहीं, वरन् समस्त शरीर के लाभ के लिए ही अनवरत गति से कार्यरत रहता है। इस प्रकार जिधर भी दृष्टिपात किया जाए, यही प्रकट होता है कि इस संसार में जो कुछ स्थिर व्यवस्था है, वह यज्ञ वृत्ति पर ही अवलम्बित है। यदि इसे हटा दिया जाए, तो सारी सुन्दरता, कुरूपता में और सारी प्रगति, विनाश में परिणत हो जायेगी। ऋषियों ने कहा है- यज्ञ ही इस संसार चक्र का धुरा है। धुरा टूट जाने पर गाड़ी का आगे बढ़ सकना कठिन है।

यज्ञीय विज्ञान

सक्रमण कोरणा भगेगा घर घर यज्ञ होने से आचार्य पं विशाल वल्लभ जी महाराज मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्रोत दबे हैं। जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास ये युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग-रागनियाँ बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मंत्रोच्चारण से भी एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत् पर तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है।

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। डी.डी.टी., फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयतन न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है। मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है।

यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण पर देवत्व की छाप डालती है। जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालता रहता है। प्राचीनकाल में तीर्थ वहीं बने हैं, जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे। जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है, उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती हैं। महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं। उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्ग जैसे आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।

यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल-विक्षेप दूर होते हैं। फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश जगता है। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्त्व, ऋषि तत्त्व की वृद्धि दिनानु-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य बहुत सरल हो जाता है। आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है, जैसे लोहे के टूटे हुए टुकड़ों को बैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है। ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा प्राप्त होता है। इसलिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिए अर्पित करना पड़ता है। लोगों के अंतःकरण में अन्त्यज वृत्ति घटे-ब्राह्मण वृत्ति बढ़े, इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव की शक्ति भरना आवश्यक है।

विधिवत् किये गये यज्ञ इतने प्रभावशाली होते हैं, जिसके द्वारा मानसिक दोषों-र्दुगुणों का निष्कासन एवं सद्भावों का अभिवर्धन नितान्त संभव है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईष्र्या, द्वेष, कायरता, कामुकता, आलस्य, आवेश, संशय आदि मानसिक उद्वेगों की चिकित्सा के लिए यज्ञ एक विश्वस्त पद्धति है। शरीर के असाध्य रोगों तक का निवारण उससे हो सकता है।

अग्निहोत्र के भौतिक लाभ भी हैं। वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कल-कारखानों के धुआँ आदि से गन्दा करते हैं। गन्दी वायु रोगों का कारण बनती है। वायु को जितना गन्दा करें, उतना ही उसे शुद्ध भी करना चाहिए। यज्ञों से वायु शुद्ध होती है। इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक बड़ा प्रयोजन सिद्ध होता है।

यज्ञ का धूम्र आकाश में-बादलों में जाकर खाद बनकर मिल जाता है। वर्षा के जल के साथ जब वह पृथ्वी पर आता है, तो उससे परिपुष्ट अन्न, घास तथा वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं। यज्ञागि्न के माध्यम से शक्तिशाली बने मन्त्रोच्चार के ध्वनि कम्पन, सुदूर क्षेत्र में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करते हैं, फलस्वरूप शरीरों की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता है।

अनेक प्रयोजनों के लिए-अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, अनेक विधानों के साथ, अनेक विशिष्ट यज्ञ भी किये जा सकते हैं। दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार उत्कृष्ट सन्तानें प्राप्त की थीं, अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में ये रहस्य बहुत विस्तारपूर्वक बताये गये हैं। विश्वामित्र आदि ऋषि प्राचीनकाल में असुरता निवारण के लिए बड़े-बड़े यज्ञ करते थे। राम-लक्ष्मण को ऐसे ही एक यज्ञ की रक्षा के लिए स्वयं जाना पड़ा था। लंका युद्ध के बाद राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। महाभारत के पश्चात् कृष्ण ने भी पाण्डवों से एक महायज्ञ कराया था, उनका उद्देश्य युद्धजन्य विक्षोभ से क्षुब्ध वातावरण की असुरता का समाधान करना ही था। जब कभी आकाश के वातावरण में असुरता की मात्रा बढ़ जाए, तो उसका उपचार यज्ञ प्रयोजनों से बढ़कर और कुछ हो नहीं सकता। आज पिछले दो महायुद्धों के कारण जनसाधारण में स्वार्थपरता की मात्रा अधिक बढ़ जाने से वातावरण में वैसा ही विक्षोभ फिर उत्पन्न हो गया है। उसके समाधान के लिए यज्ञीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक हो गया है।

यज्ञ चिकित्सा

यज्ञ’- एक नैनो टेक्नोलॉजी

वर्तमान समय नैनो टेक्नोलॉजी का समय है ऐसा कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से पदार्थों को तोड़ कर के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम कर उसके अन्दर प्रसुप्त शक्तियों को उजागर सूक्ष्मतर व अ करके थोड़े पदार्थ से अनन्त असीम लाभ प्राप्त करने की ज एक अनोखी विधा प्राचीन काल से ही चली आ रही है, वह स है ‘यज्ञ’। आइये जानते है कैसे?

आयुर्वेद में सामान्य रूप से बीमार व्यक्ति को वटी, चूर्ण, आसव, अरिष्ट आदि औषध देकर के नैरोग्य के लिए प्रयास किया जाता है। लेकिन असाध्य कोटि में जब रोग प पहुंच जाता है या फिर वटी आदि दवाओं का प्रयोग प्रभाव नहीं दिखाता है, उस समय आयुर्वेद के वैद्य रस- रसायन स विद्या अर्थात् ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ का प्रयोग जिसको सामान्य स रूप से भस्म कहा जाता है, उसका प्रयोग लेते हैं व असाध्य प कोटि के रोगियों को भी तुरन्त आरोग्य प्रदान करने का उ कार्य संभव या सम्पन्न हो पाता है! क्यो?

क्योंकि सामान्य रूप से ली गयी औषध ठोस या द्रव रूप में है, जो नैनो नहीं है अर्थात् उसके अन्दर छिपी प्रसुप्त शक्तियाँ पूर्णरूप से जागृत अवस्था में नहीं है। तो उस कार्य को अर्थात् प्रसुप्त अवस्था में स्थित शक्तियों को उभारने के लिए जिस रोग के लिए जिस औषध द्रव्य की आवश्यकता होती है, उसको पहले जलाकर भस्म बना दिया जाता है। अर्थात् उतनी सूक्ष्म की हथेली पर रखकर फूक मारे तो उड़कर के वायुभूत हो जाये ऐसा सूक्ष्म बना दिया जाता है। फिर भी हम उनकी शक्ति को पूर्णतः उद्भूत नहीं कर पातें, अतः तब उस भस्म को खरल करके उनके कणों (particles) को तोड़ा जाता है। बार-बार उस पदार्थ को कई दिनों तक निरन्तर तरल कर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम रूप में पार्टीकलों को तोड़ दिया जाता है और जैसे-जैसे अधिक तरल किया जाता है उतना ही पार्टीकल टूटता है, उतना ही ज्यादा सूक्ष्म होता जाता है व जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम पदार्थ होता जाता है, उतना ही उसके अन्दर प्रसुप्त शक्ति उद्भूत होती चली जाती है और एक ऐसी स्थिति में आ जाती है, जो सबसे शक्तिशाली पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। अतः वैद्य उस औषध को कुछ चंद ग्राम में देता है व उसकी भी साठ पुड़ियाँ बनाकर एक माह के लिए देता है तथा वह इतना शक्तिशाली पदार्थ के रूप में आ जाता है कि जब कोई दवाई काम नहीं करती या मरणासन असाध्य कोटि के रोगी हो, उसको भी तुरन्त स्वस्थ कर देती है। ऐसी अद्भुत शक्ति में परिणित हो जाती है यह है, हमारे आयुर्वेद शास्त्र की नैनो टेक्नोलॉजी।

इसी प्रकार होम्योपैथी को देखे तो मात्र २०० साल पुरानी पद्धति है, वह भी आज समाज में बढ़ चढ़ कर लोकप्रिय हो रही है, उसका तो मूल सिद्धान्त ही नैनो टेक्नोलॉजी है। होम्योपैथी में भी जिस पदार्थ कि हमें आवश्यकता होती है, उस गुण, कर्म, स्वभाव वाले पदार्थ को आसुत जल (Distilled water) के माध्यम से पदार्थ को नैनो किया जाता है, सूक्ष्म किया जाता है। वह इतना सूक्ष्म हो जाता है, कि इलेक्ट्रॉन के रूप में कन्वर्ट हो जाता है, जिसका सेवन करने पर उसी समय तुरन्त परिणाम देने वाली हो जाती है, क्योंकि पदार्थ नैनो हो गया और नैनो में शक्ति होती है।

उसी प्रकार ‘यज्ञ’ भी पूर्णतः व सरलतम तरीके से पदार्थों को नैनो करने कि अमोघ विधा व विद्या है। धरती पर जितने भी पदार्थ पाये जाते हैं, उसमें से सबसे सूक्ष्म से सूक्ष्मतम कोई पदार्थ है, तो वह है ‘अग्नि’। धरती में तीन रूपों में पदार्थ पाये जाते हैं- ठोस, द्रव्य और गैस। इनमें ठोस पदार्थ कठोर से कठोर पत्थर को ले और उस पत्थर के अन्दर पानी डालना चाहे तो नहीं डाल सकते, हवा को उस पत्थर के अन्दर डालना चाहे तो नहीं डाल सकते, इसी प्रकार कील आदि उस कठोर व ठोस पत्थर में डालना चाहे तो नहीं डाल सकते अर्थात् ठोस व ठोसतम पत्थर के अंदर कोई जगह नहीं है, उसके अन्दर कोई भी ठोस-द्रव्य-गैस तीनों में से किसी का भी प्रवेश नहीं करा सकते। कोई उसके अंदर प्रवेश पायें ऐसी सम्भावना तक नहीं है। लेकिन उस कठोर पत्थर को अग्नि के ऊपर रख दे, तो वह अग्नि उस पत्थर के अणु-परमाणु के अंदर तक प्रवेश पा जाती है। इसी प्रकार द्रव पदार्थ, जल तथा गैस रूप पदार्थ वायु के भी अणु-परमाणु के अन्दर अग्नि प्रवेश पा जाती है। अर्थात् धरती पर सबसे सूक्ष्म कोई पदार्थ है, तो वह है अग्नि। उस अग्नि का एक विशेष स्वभाव है, कि उसके सम्पर्क में जो भी पदार्थ आता है, उसको अपने जैसा बना लेती है अर्थात् सूक्ष्मतम बना देती है। जैसे अग्नि में समिधा (Wood) की आहुति देते हैं, तो वह अग्निस्वरूप हो जाती, इसी प्रकार घी (Ghee) व जड़ी-बूटियों को अग्नि में आहुत करते हैं, तो वह भी उतना ही सूक्ष्म हो जाती है और जो पदार्थ जितना । ज्यादा सूक्ष्म होता है, उतना ही ज्यादा शक्तिशाली व बड़ा परिणाम देने वाला हो जाता है।

अतः अग्नि में जो भी पदार्थ डाला जाता है वह रूपान्तरित हो जाता है। उसका नाश नहीं होता (सर्वथा अभाव नहीं होता) अपितु कण (पार्टीकल) वायु (Gas) एवं ऊर्जा (Energy) के रूप में रूपांतरित – परिवर्तित हो जाता है। नाश शब्द ‘णश अदर्शने’ धातु से अदर्शन अर्थ में है अर्थात् पहले हमें यज्ञ का सामान दिखायी दे रहा है जैसे- घी, समिधा, जड़ी-बूटी आदि, जब उसे अग्नि में आहुत कर देते है, तो वह अग्नि जैसा ही सूक्ष्म हो जाता है। (कण, गैस व ऊर्जा में रूपांतरित हो गया), उसका सर्वथा अभाव नहीं हुआ। जैसे हमारे पास एक पात्र में जल रखा है, उसे अग्नि पर रख दिया (सौ डिग्री पर गर्म करते हैं) तो वह वाष्प बन जाता है, वह पात्र खाली हो जाता है। पात्र में जो पानी दिख रहा था, वह अब नहीं दिख रहा है। क्या हम कह पायेंगे कि यह पानी नष्ट हो गया, नहीं क्योंकि वह वाष्प रूप में रूपातंरित हो गया, उसका सर्वथा अभाव नहीं हुआ। इसी प्रकार हर कोई पदार्थ रूपांतरित होता है, उसका सर्वथा अभाव नहीं होता है, यही नाश शब्द का शाब्दिक व वास्तिवक अर्थ है।

इसी को स्पष्ट करते हुए ‘महर्षि कपिल’ ने सांख्यदर्शन में ‘नाशः कारणलयः’ – (१.८६) सूत्र दिया है- जिसका का अर्थ है- अपने कारण में लय हो जाना अर्थात् अनन्त ऊर्जा में रूपांतरित हो जाना, जो ऊर्जा सबसे ज्यादा प्रभावित परिणाम देने वाली होती है। हमारे स्थूल शरीर के साथ मन पर तो उसका चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता ही है, लेकिन उसके साथ-साथ हमारे सूक्ष्म शरीर एवं पंच- कोश अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानम्य एवं आनन्दमय पर भी चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है एवं पंचप्राण तथा पंच उपप्राणों का पोषण व अष्टचक्रों-मूलाधार से लेकर सहस्रार पर्यन्त प्रभावी रूप से सत्व का संचार कर मानवीय चेतना का उत्कर्ष कर अतिमानस चेतना से युक्त करने का कार्य भली प्रकार ‘यज्ञ’ चिकित्सा से सम्भव होता है।

यज्ञीय प्रेरणाएँ

यज्ञ आयोजनों के पीछे जहाँ संसार की लौकिक सुख-समृद्धि को बढ़ाने की विज्ञान सम्मत परंपरा सन्निहित है-जहाँ देव शक्तियों के आवाहन-पूजन का मंगलमय समावेश है, वहाँ लोकशिक्षण की भी प्रचुर सामग्री भरी पड़ी है। जिस प्रकार ‘बाल फ्रेम’ में लगी हुई रंगीन लकड़ी की गोलियाँ दिखाकर छोटे विद्यार्थियों को गिनती सिखाई जाती है, उसी प्रकार यज्ञ का दृश्य दिखाकर लोगों को यह भी समझाया जाता है कि हमारे जीवन की प्रधान नीति ‘यज्ञ’ भाव से परिपूर्ण होनी चाहिए। हम यज्ञ आयोजनों में लगें-परमार्थ परायण बनें और जीवन को यज्ञ परंपरा में ढालें। हमारा जीवन यज्ञ के समान पवित्र, प्रखर और प्रकाशवान् हो। गंगा स्नान से जिस प्रकार पवित्रता, शान्ति, शीतलता, आदरता को हृदयंगम करने की प्रेरणा ली जाती है, उसी प्रकार यज्ञ से तेजस्विता, प्रखरता, परमार्थ-परायणता एवं उत्कृष्टता का प्रशिक्षण मिलता है। यज्ञ वह पवित्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा अपावन एवं पावन के बीच सम्पर्क स्थापित किया जाता है। यज्ञ की प्रक्रिया को जीवन यज्ञ का एक रिहर्सल कहा जा सकता है। अपने घी, शक्कर, मेवा, औषधियाँ आदि बहुमूल्य वस्तुएँ जिस प्र्रकार हम परमार्थ प्रयोजनों में होम करते हैं, उसी तरह अपनी प्रतिभा, विद्या, बुद्धि, समृद्धि, सार्मथ्य आदि को भी विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए। इस नीति को अपनाने वाले व्यक्ति न केवल समाज का, बल्कि अपना भी सच्चा कल्याण करते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष, देवमानव हुए हैं, उन सभी को यही नीति अपनानी पड़ी है। जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढ़ा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।

यज्ञीय प्रेरणाओं का महत्त्व समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है। उसकी शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं। वे शिक्षाएँ इस प्रकार हैं-

  1. जो कुछ हम बहुमूल्य पदार्थ अग्नि में हवन करते हैं, उसे वह अपने पास संग्रह करके नहीं रखती, वरन् उसे सर्वसाधारण के उपयोग के लिए वायुमण्डल में बिखेर देती है। ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का प्रयोग हम भी वैसा ही करें, जो हमारा यज्ञ पुरोहित अपने आचरण द्वारा सिखाता है। हमारी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा आदि विभूतियों का न्यूनतम उपयोग हमारे लिए और अधिकाधिक उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए।
  2. जो वस्तु अग्नि के सम्पर्क में आती है, उसे वह दुरदुराती नहीं, वरन् अपने में आत्मसात् करके अपने समान ही बना लेती है। जो पिछड़े या छोटे या बिछुड़े व्यक्ति अपने सम्पर्क में आएँ, उन्हें हम आत्मसात् करने और समान बनाने का आदर्श पूरा करें।
  3. अग्नि की लौ कितना ही दबाव पड़ने पर नीचे की ओर नहीं होती, वरन् ऊपर को ही रहती है। प्रलोभन, भय कितना ही सामने क्यों न हो, हम अपने विचारों और कार्यों की अधोगति न होने दें। विषम स्थितियों में अपना संकल्प और मनोबल अग्नि शिखा की तरह ऊँचा ही रखें।
  4. अग्नि जब तक जीवित है, उष्णता एवं प्रकाश की अपनी विशेषताएँ नहीं छोड़ती। उसी प्रकार हमें भी अपनी गतिशीलता की गर्मी और धर्म-परायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए। जीवन भर पुरुषार्थी और कर्त्तव्यनिष्ठ बने रहना चाहिए।
  5. यज्ञाग्नि का अवशेष भस्म मस्तक पर लगाते हुए हमें सीखना होता है कि मानव जीवन का अन्त मुट्ठी भर भस्म के रूप में शेष रह जाता है। इसलिए अपने अन्त को ध्यान में रखते हुए जीवन के हर पल के सदुपयोग का प्रयत्न करना चाहिए।

अपनी थोड़ी-सी वस्तु को वायुरूप में बनाकर उन्हें समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने-पराये, मित्र-शत्रु का भेद किये साँस द्वारा इस प्रकार गुप्तदान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्त्व खिला दिया, सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है, कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है।

यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। अन्य उपासनाएँ या धर्म-प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई अकेला कर या करा सकता है; पर यज्ञ ऐसा कार्य है, जिसमें अधिक लोगों के सहयोग की आवश्यकता है। होली आदि पर्वों पर किये जाने वाले यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों से सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएँ विकसित होती हैं।

प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व-त्यौहार, संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है। यज्ञ भारत की एक मान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है। धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिए ऐसे आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है।

गायत्री सद्बुद्धि की देवी और यज्ञ सत्कर्मों का पिता है। सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए गायत्री माता और यज्ञ पिता का युग्म हर दृष्टि से सफल एवं समर्थ सिद्ध हो सकता है। गायत्री यज्ञों की विधि-व्यवस्था बहुत ही सरल, लोकप्रिय एवं आकर्षक भी है। जगत् के दुर्बुद्धिग्रस्त जनमानस का संशोधन करने के लिए सद्बुद्धि की देवी गायत्री महामन्त्र की शक्ति एवं सार्मथ्य अद्भुत भी है और अद्वितीय भी।

नगर, ग्राम अथवा क्षेत्र की जनता को धर्म प्रयोजनों के लिए एकत्रित करने के लिए जगह-जगह पर गायत्री यज्ञों के आयोजन करने चाहिए। गलत ढंग से करने पर वे महँगे भी होते हैं और शक्ति की बरबादी भी बहुत करते हैं। यदि उन्हें विवेक-बुद्धि से किया जाए, तो कम खर्च में अधिक आकर्षक भी बन सकते हैं और उपयोगी भी बहुत हो सकते हैं।

अपने सभी कर्मकाण्डों, धर्मानुष्ठानों, संस्कारों, पर्वों में यज्ञ आयोजन मुख्य है। उसका विधि-विधान जान लेने एवं उनका प्रयोजन समझ लेने से उन सभी धर्म आयोजनों की अधिकांश आवश्यकता पूरी हो जाती है।

लोकमंगल के लिए, जन-जागरण के लिए, वातावरण के परिशोधन के लिए स्वतंत्र रूप से भी यज्ञ आयोजन सम्पन्न किये जाते हैं। संस्कारों और पर्व-आयोजनों में भी उसी की प्रधानता है।

प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को यज्ञ प्रक्रिया से परिचित होना ही चाहिए।

भगवद्गीता के अनुसार यज्ञ

भगवद्गीता के अनुसार परमात्मा के निमित्त किया कोई भी कार्य यज्ञ कहा जाता है। परमात्मा के निमित्त किये कार्य से संस्कार पैदा नहीं होते न कर्म बंधन होता है। भगवदगीता के चौथे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते हुए विस्तार पूर्वक विभिन्न प्रकार के यज्ञों को बताया गया है।

श्री भगवन कहते हैं, अर्पण ही ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, कर्म रूपी समाधि भी ब्रह्म है और जिसे प्राप्त किया जाना है वह भी ब्रह्म ही है। यज्ञ परब्रह्म स्वरूप माना गया है। इस सृष्टि से हमें जो भी प्राप्त है, जिसे अर्पण किया जा रहा है, जिसके द्वारा हो रहा है, वह सब ब्रह्म स्वरूप है अर्थात सृष्टि का कण कण, प्रत्येक क्रिया में जो ब्रह्म भाव रखता है वह ब्रह्म को ही पाता है अर्थात ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। कर्म योगी देव यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा अन्य ज्ञान योगी ब्रह्म अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ का हवन करते हैं। देव पूजन उसे कहते हैं जिसमें योग द्वारा अधिदैव अर्थात जीवात्मा को जानने का प्रयास किया जाता है। कई योगी ब्रह्म अग्नि में आत्मा को आत्मा में हवन करते हैं अर्थात अधियज्ञ (परमात्मा) का पूजन करते हैं।

कई योगी इन्द्रियों के विषयों को रोककर अर्थात इन्द्रियों को संयमित कर हवन करते हैं, अन्य योगी शब्दादि विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नि में हवन करते है अर्थात मन से इन्द्रिय विषयों को रोकते हैं अन्य कई योगी सभी इन्द्रियों की क्रियाओं एवं प्राण क्रियाओं को एक करते हैं अर्थात इन्द्रियों और प्राण को वश में करते हैं, उन्हें निष्क्रिय करते हैं। इन सभी वृत्तियों को करने से ज्ञान प्रकट होता है ज्ञान के द्वारा आत्म संयम योगाग्नि प्रज्वलित कर सम्पूर्ण विषयों की आहुति देते हुए आत्म यज्ञ करते हैं। इस प्रकार भिन्न भिन्न योगी द्रव्य यज्ञ तप यज्ञ तथा दूसरे योग यज्ञ करने वाले है और कई तीक्ष्णव्रती होकर योग करते हैं यह स्वाध्याय यज्ञ करने वाले पुरुष शब्द में शब्द का हवन करते है। इस प्रकार यह सभी कुशल और यत्नशील योगाभ्यासी पुरुष जीव बुद्धि का आत्म स्वरूप में हवन करते हैं।

द्रव्य यज्ञ- इस सृष्टि से जो कुछ भी हमें प्राप्त है उसे ईश्वर को अर्पित कर ग्रहण करना। तप यज्ञ- जप कहाँ से हो रहा है इसे देखना तप यज्ञ है। स्वर एवं हठ योग क्रियाओं को भी तप यज्ञ जाना जाता है। योग यज्ञ- प्रत्येक कर्म को ईश्वर के लिया कर्म समझ निपुणता से करना योग यज्ञ है। तीक्ष्ण वृती- यम नियम संयम आदि कठोर शारीरिक और मानसिक क्रियाओं द्वारा मन को निग्रह करने का प्रयास. शम, दम, उपरति, तितीक्षा, समाधान, श्रद्धा। मन को संसार से रोकना शम है। बाह्य इन्द्रियों को रोकना दम है। निवृत्त की गयी इन्द्रियों भटकने न देना उपरति है। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान अपमान को शरीर धर्म मानकरसरलता से सह लेना तितीक्षा है। रोके हुए मन को आत्म चिन्तन में लगाना समाधान है। कई योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं जैसे अनुलोम विलोम से सम्बंधित श्वास क्रिया तथा कई प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं जैसे गुदा संकुचन अथवा सिद्धासन। कई दोनों प्रकार की वायु, प्राण और अपान को रोककर प्राणों को प्राण में हवन करते हैं जैसे रेचक और कुम्भक प्राणायाम। कई सब प्रकार के आहार को जीतकर अर्थात नियमित आहार करने वाले प्राण वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं अर्थात प्राण को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा काम क्रोध एवं अज्ञान रूपी पाप का नाश करने वाले सभी; यज्ञ को जानने वाले हैं अर्थात ज्ञान से परमात्मा को जान लेते हैं।

यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले पर ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं अर्थात यज्ञ क्रिया के परिणाम स्वरूप जो बचता है वह ज्ञान ब्रह्म स्वरूप है। इस ज्ञान रूपी अमृत को पीकर वह योगी तृप्त और आत्म स्थित हो जाते हैं परन्तु जो मनुष्य यज्ञाचरण नहीं करते उनको न इस लोक में कुछ हाथ लगता है न परलोक में। इस प्रकार बहुत प्रकार की यज्ञ विधियां वेद में बताई गयी हैं। यह यज्ञ विधियां कर्म से ही उत्पन्न होती हैं। इस बात को जानकर कर्म की बाधा से जीव मुक्त हो जाता है। द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है। द्रव्यमय यज्ञ सकाम यज्ञ हैं और अधिक से अधिक स्वर्ग को देने वाले हैं परन्तु ज्ञान यज्ञ द्वारा योगी कर्म बन्धन से छुटकारा पा जाता है और परम गति को प्राप्त होता है। सभी कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। ज्ञान से ही आत्म तृप्ति होती है और कोई कर्म अवशेष नहीं रहता।

प्रज्ज्वलित अग्नि सभी काष्ठ को भस्म कर देती है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि सभी कर्म फलों को; उनकी आसक्ति को भस्म कर देती है। इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है क्योंकि जल, अग्नि आदि से यदि किसी मनुष्य अथवा वस्तु को पवित्र किया जाय तो वह शुद्धता और पवित्रता थोड़े समय के लिए ही होती है, जबकि ज्ञान से जो मनुष्य पवित्र हो जाय वह पवित्रता सदैव के लिए हो जाती है। ज्ञान ही अमृत है और इस ज्ञान को लम्बे समय तक योगाभ्यासी पुरुष अपने आप अपनी आत्मा में प्राप्त करता है क्योंकि आत्मा ही अक्षय ज्ञान का श्रोत है। जिसने अपनी इन्द्रियों का वश में कर लिया है तथा निरन्तर उन्हें वशमें रखता है, जो निरन्तर आत्म ज्ञान में तथा उसके उपायों में श्रद्धा रखता है जैसे गुरू, शास्त्र, संत आदि में। ऐसा मनुष्य उस अक्षय ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होते ही परम शान्ति को प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त होने के बाद उसका मन नहीं भटकता, इन्द्रियों के विषय उसे आकर्षित नहीं करते, लोभ मोह से वह दूर हो जाता है तथा निरन्तर ज्ञान की पूर्णता में रमता हुआ आनन्द को प्राप्त होता है।

संक्षिप्त गायत्री हवन विधि:

  • तैयारी: पवित्र होकर आसन पर बैठें। हवन कुंड/पात्र में आम की लकड़ियाँ और कपूर रखकर अग्नि प्रज्वलित करें।
  • पवित्रिकरण व आचमन: ॐ अपवित्रः पवित्रो वा… मंत्र बोलकर खुद पर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कें। ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः कहकर तीन बार आचमन करें।
  • दीपन व अग्नि स्थापन: अग्नि को प्रज्वलित करें और गायत्री मंत्र पढ़ते हुए अग्निदेव का ध्यान करें।
  • आहुतियां: गायत्री मंत्र का पूरा पाठ करें: “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्”
      हर बार “…धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्” के बाद “स्वाहा” बोलकर अग्नि में आहुति (घी/सामग्री) डालें।
    • पूर्णाहूति: अंत में खीर, नारियल या विशेष सामग्री से ‘पूर्णाहूति’ दें।
    • क्षमा प्रार्थना व विसर्जन: अंत में हाथ जोड़कर अग्निदेव से भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और “ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:” के साथ हवन समाप्त करें। 
    • पवित्रीकरण मन्त्र
      ॐ अपवित्र: पवित्रो वा, सर्वावस्थाम गतोपि वा ।
      ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्ष:, पुनातु पुण्डरीकाक्ष:,पुनातु।
      आचमन
      ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
      ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।
      ॐ सत्यं यश: श्रीर्मयि, श्री: श्रयतां स्वाहा।
      शिखावंदन
      ॐ चिदरूपिणी महामाये दिव्यतेज़: समन्विते।
      तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धि कुरुष्व में ।।
      न्यास
      ॐ वाड’ में आस्येस्तु । ( मुख को)
      ॐ नासोर्मे प्रणोस्तु ( नासिक के दोनों छिद्रों को )
      ॐ अक्षनोर्मे चक्षरस्तु ( दोनों नेत्रों को )
      ॐ कर्णयोर्म श्रोत्रमस्तु ( दोनों कानो को )
      ॐ बहोरमे बलमस्तु ( दोनों भुजाओ को )
      ॐ उवोर्मे ओजोस्तु ( दोनों जंघाओं को )
      चंदनधारानम
      ॐ चंदनस्य महत्पून्यं पवित्रं पापनाशनम।
      आपदां हरते नित्यं लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा।।
      कलश पूजनं
      ॐ कलशस्य मुखे विष्णु, कण्ठे रूद्र समाश्रित।
      मुले त्वस्य स्थितो ब्रह् मध्ये मातृ गाना:स्मृता।।
      कुक्षो तू सागरा सर्वे सप्तदीपा वसुंधरा।
      ऋग्वेदोथ यजुर्वेद: सामवेद हाथवर्ण1।
      अंगैश्च सहिता: सर्वे,कालशंन्तु समाश्रिताः।
      अत्र गायत्री सावित्री,शांति पुष्टिकरी सदा।।
      दीप पूजनं
      ॐ अग्निज्योतिजयतिराग्नि स्वाहा।सूर्यो ज्योतिज्योति:सूर्य:स्वाहा अग्निर्वरचो ज्योतिर्वाच स्वाहा।
      पहली 7 आहुति घी से इन मंत्रों के साथ
      1 ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये इदं न मम।।
      2 ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय इदं न मम।।
      3 ॐ अग्नये स्वाह । इदं अग्नये इदं न मम।।
      4 ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय इदं न मम।।
      5 ॐ भू: स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम।।
      6 ॐ भुवः स्वहा। इदं वायवे इदं न मम।।
      7 ॐ स्व: स्वाहा इदं सूर्याय इदं न मम।।

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