प्रज्ञानं ब्रह्म” एक संस्कृत महावाक्य है जिसका अर्थ है “ज्ञान ही ब्रह्म है” या “चेतना ही ब्रह्म है”। यह ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद से लिया गया है और यह बताता है कि परम ज्ञान या उच्चतम चेतना ही वह अंतिम, अपरिवर्तनीय सत्य है जो समस्त अस्तित्व का आधार है।
मुख्य बिंदु:
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स्रोत:
यह ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद से लिया गया है और अद्वैत वेदांत के चार महावाक्यों में से एक है।
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अर्थ:
इसका अर्थ है कि उच्चतम ज्ञान या शुद्ध चेतना ही ब्रह्म है। ‘प्रज्ञान’ का अर्थ है उत्कृष्ट ज्ञान या चेतना, और ‘ब्रह्म’ का अर्थ है अंतिम सत्य।
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व्याख्या:यह महावाक्य इस विचार को पुष्ट करता है कि व्यक्तिगत चेतना ही स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।
- यह बताता है कि वह विशुद्ध, बुद्धि-रूप, मुक्त-रूप और अविनाशी रूप ही सत्य, ज्ञान और सच्चिदानंद स्वरूप है, जिसका ध्यान किया जाना चाहिए।
- यह तर्क से परे एक सहज ज्ञान और जागरूकता को संदर्भित करता है, जो ही परम वास्तविकता है।
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अद्वैत वेदांत में महत्व:यह वाक्य अद्वैत वेदांत के सार को समझने में सहायक है, जो इस बात पर बल देता है कि चेतना ही समस्त अस्तित्व का आधार है।