अयं आत्मा ब्रह्म” का चित्र प्राप्त करना सीधा संभव नहीं है, क्योंकि यह एक दार्शनिक महावाक्य है न कि कोई दृश्य वस्तु. इसका अर्थ है “यह आत्मा ही ब्रह्म है”, जो अथर्ववेद के मांडूक्य उपनिषद से लिया गया है. इसका कोई विशिष्ट चित्र नहीं होता, बल्कि यह व्यक्तिगत आत्मा और ब्रह्मांडीय ब्रह्म की एकता और अद्वैत को दर्शाता है.
“अयं आत्मा ब्रह्म” का अर्थ और महत्व:
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आत्मा:यह वह चेतन तत्त्व है जो शरीर और मन से परे है; यह हर व्यक्ति में अनुभव होने वाला ‘मैं’ है.
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ब्रह्म:यह वह परम तत्त्व है जो सभी का मूल कारण है, नित्य, निर्विकार और सर्वव्यापी है.
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एकता:यह महावाक्य बताता है कि जो आत्मा हम भीतर अनुभव करते हैं, वह कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि वही परम सत्य ‘ब्रह्म’ है.
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अद्वैत वेदांत:अद्वैत वेदांत में इसे मोक्ष की कुंजी माना जाता है, यह दर्शाता है कि आत्मा और ब्रह्म में कोई द्वैत (फर्क) नहीं है, वे एक ही हैं.