आत्मवत् सर्वभूतेषु” (ātmavat sarvabhūteṣu) का अर्थ है सभी प्राणियों को स्वयं के समान देखना. यह एक संस्कृत उक्ति है जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति सभी जीवित प्राणियों को अपनी आत्मा के समान समझता है और उन्हीं के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह स्वयं के साथ करता है, वही सच्चा विद्वान या पंडित है.
इस उक्ति का विस्तार:
आत्मवत् (ātmavat): स्वयं के समान, आत्मा के समान.
सर्वभूतेषु (sarvabhūteṣu): सभी प्राणियों में, सभी जीवित प्राणियों में.
अर्थ: इसका भाव है कि सभी प्राणियों में एक समान आत्मा है, और हमें सबके साथ सम्मान, सहानुभूति और प्रेम से पेश आना चाहिए, जैसे हम स्वयं के साथ करते हैं.
यह सिद्धांत भारतीय दर्शन और संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जो समाज में समानता, सहानुभूति और प्रेम का संदेश देता है.
आत्मवत् सर्वभूतेशु सभी को अपना जैसा समझ व्यवहार करे