एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” ऋग्वेद (1.164.46)
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” ऋग्वेद (1.164.46) का एक प्रसिद्ध वैदिक सूक्त है, जिसका अर्थ है- “सत्य या ईश्वर एक ही है, लेकिन ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं”। यह सनातन धर्म में निहित विविधता में एकता, सर्वधर्म समभाव और उदारता के दर्शन को दर्शाता है, जहाँ परम वास्तविकता को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है।
मूल मंत्र और अर्थ:
मंत्र: एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।
अर्थ: ‘एकम् सत्’ (सत्य एक है), ‘विप्रा:’ (विद्वान/ज्ञानी), ‘बहुधा’ (कई तरह से), ‘वदन्ति’ (कहते/बोलते हैं)।
भावार्थ: सर्वोच्च सत्ता, परमात्मा या परम सत्य एक ही है, लेकिन ऋषियों और बुद्धिमान लोगों ने उसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि जैसे विभिन्न नामों से वर्णित किया है।
उद्गम: यह ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 164वें सूक्त का 46वां मंत्र है।
दर्शन: यह विचार बताता है कि ईश्वर को पाने के रास्ते (हठयोग,
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” ऋग्वेद (1.164.46) का एक प्रसिद्ध वैदिक सूक्त है, जिसका अर्थ है- “सत्य या ईश्वर एक ही है, लेकिन ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं”। यह सनातन धर्म में निहित विविधता में एकता, सर्वधर्म समभाव और उदारता के दर्शन को दर्शाता है, जहाँ परम वास्तविकता को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है।
मूल मंत्र और अर्थ:
मंत्र: एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।
अर्थ: ‘एकम् सत्’ (सत्य एक है), ‘विप्रा:’ (विद्वान/ज्ञानी), ‘बहुधा’ (कई तरह से), ‘वदन्ति’ (कहते/बोलते हैं)।
भावार्थ: सर्वोच्च सत्ता, परमात्मा या परम सत्य एक ही है, लेकिन ऋषियों और बुद्धिमान लोगों ने उसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि जैसे विभिन्न नामों से वर्णित किया है।
उद्गम: यह ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 164वें सूक्त का 46वां मंत्र है।
दर्शन: यह विचार बताता है कि ईश्वर को पाने के रास्ते (हठयोग, राजयोग, ज्ञानयोग) अलग हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य एक ही है।
महत्व: यह कट्टरता को नकारता है और यह संदेश देता है कि सभी मत-मतांतर एक ही परम शक्ति की ओर संकेत करते हैं। राजयोग, ज्ञानयोग) अलग हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य एक ही है।