Jagrayam Foundation

वर्ष प्रतिपदा अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : नवसंवत्सर का महत्व

वर्ष प्रतिपदा अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : नवसंवत्सर का महत्व १)ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि का सृजन २)भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया ३)सतयुग का प्रारंभ हुआ था। ४)श्रीराम का राज्‍याभिषेक ५)माँ दुर्गा नवरात्र साधना व्रत प्रारम्‍भ ६)युगाब्‍द का आरंभ ७)युधिष्‍ठिर का राज्याभिषेक ८)उज्‍जयिनी सम्राटविक्रमादित्‍य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्‍भ ९)शालिवाहन शक संवत् (भारत सरकार का राष्‍ट्रीय पंचांग) का… Continue reading वर्ष प्रतिपदा अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : नवसंवत्सर का महत्व

यज्ञ ( हवन ) सनातन  हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्राचीन पवित्र महत्वपूर्ण अनुष्ठान

यज्ञ (हवन) हिंदू धर्म का एक प्राचीन, पवित्र अनुष्ठान है, जिसमें अग्नि के माध्यम से देवताओं को आहुति (हविष्य) अर्पित की जाती है। हवन (यज्ञ या अग्निहोत्र) यह त्याग, समर्पण और परोपकार की भावना को दर्शाता है, जो वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ संपन्न होता है। यज्ञ का मुख्य उद्देश्य वायु शोधन, रोग निवारण, मानसिक शांति और… Continue reading यज्ञ ( हवन ) सनातन  हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्राचीन पवित्र महत्वपूर्ण अनुष्ठान

गायत्री मंत्र

गायत्री मन्त्र हिन्दू ब्राह्मणों का मूल मंत्र है, विशेषकर उनका जो जनेऊ धारण करते हैं। इस मंत्र के द्वारा वे देवी का आह्वान करते हैं। यह मंत्र सूर्य भगवान को समर्पित है। इसलिए इस मंत्र को सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाता है। वैदिक शिक्षा लेने वाले युवकों के उपनयन और जनेऊ संस्कार के समय भी इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।… Continue reading गायत्री मंत्र

देवपूजनम

श्रीमन्न महागणपति नमः जय श्री चिन्तामण इच्छामन सिद्धिविनायक गणपति देव ॐ श्री परमात्मने नमः। ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्ये माक्षर्भि यजत्राः । स्थिरै रङ्गै स्तुष्टु वां सस्तनूभिः । व्यशेम देव हितं यदायुः ॥ (1) पवित्र करण ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।। (2) आचमनम् ॐ… Continue reading देवपूजनम

देश बना गणतंत्र , सर्वोच्च बन लागू हुआ भारत का संविधान !

क्यो है भारत का संविधान सर्वोच्च : क्योंकि उससे जुड़ी है हर देश वासी , राष्ट्र भक्त की आत्मा और उसका प्रतिबद्ध प्राण संकल्प । संविधान सभा में देश के सभी भागो क्षेत्रों वर्गों के अप्रतिम योग्यता धारक विद्वान मनीषी समाजसुधारक विधिवेत्ता शिक्षक राष्ट्र भक्त सम्मिलित थे । ऐतिहासिक घटनाक्रम उद्देश्य व गठन: संविधान सभा… Continue reading देश बना गणतंत्र , सर्वोच्च बन लागू हुआ भारत का संविधान !

प्रार्थना

प्रार्थना जय श्री चिंतामण इच्छामन सिद्धिविनायक गणपति देव सदा प्रसन्न!! जय माँ हो श्री हरसिद्धि देवी सदा प्रसन्न !! जय माँ श्री पीताम्बरा बग़लामुखी देवी सदा प्रसन्न !! जय श्री महाकाल !! ॐ ब्रह्मानन्द परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं, तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं, सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं, सद्गुरू तं नमामि॥ अखण्डानन्दबोधाय, शिष्यसंतापहारिणे। सच्चिदानन्दरूपाय, तस्मै श्री… Continue reading प्रार्थना

ईशावास्यमिदं सर्वं : सम्पूर्ण चराचर जगत ईश्वर से आच्छादित है

ईशावास्यम् इदं सर्वम्” का अर्थ है कि जो कुछ भी इस संसार में है, वह सब ईश्वर (परम सत्ता) से व्याप्त या आच्छादित है। यह मंत्र ईशावास्योपनिषद का पहला मंत्र है, जो यह सिखाता है कि इस ब्रह्मांड की हर वस्तु ईश्वर की है, और हमें त्याग की भावना से उसका भोग करना चाहिए, दूसरों… Continue reading ईशावास्यमिदं सर्वं : सम्पूर्ण चराचर जगत ईश्वर से आच्छादित है

आत्मवत् सर्वभूतेशु सभी को अपना जैसा समझ व्यवहार करे

आत्मवत् सर्वभूतेषु” (ātmavat sarvabhūteṣu) का अर्थ है सभी प्राणियों को स्वयं के समान देखना. यह एक संस्कृत उक्ति है जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति सभी जीवित प्राणियों को अपनी आत्मा के समान समझता है और उन्हीं के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह स्वयं के साथ करता है, वही सच्चा विद्वान या… Continue reading आत्मवत् सर्वभूतेशु सभी को अपना जैसा समझ व्यवहार करे

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः “हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे”

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः यजुर्वेद के नौवें अध्याय की 23वीं कंडिका से लिया गया है। इसका अर्थ है, ‘हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।’ वाज॑स्ये॒मं प्र॑स॒वः सु॑षु॒वेऽग्रे॒ सोम॒ꣳ राजा॑न॒मोष॑धीष्व॒प्सु। ताऽअ॒स्मभ्यं॒ मधु॑मतीर्भवन्तु व॒यꣳ रा॒ष्ट्रे जा॑गृयाम पु॒रोहि॑ताः॒ स्वाहा॑ ॥२३॥ पद पाठ वाज॑स्यः। इ॒मम्। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। सु॒षु॒वे। सु॒सु॒व॒ इति सुसुवे। अग्रे॑। सोम॑म्। राजा॑नम्।… Continue reading वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः “हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे”

अहंब्रह्मास्मि” का अर्थ है “मैं ब्रह्म हूँ” या “मैं ही वह परम सत्य हूँ”

अहं ब्रह्मास्मि” का अर्थ है “मैं ब्रह्म हूँ” या “मैं ही वह परम सत्य हूँ” अहं ब्रह्मास्मि” का अर्थ है “मैं ब्रह्म हूँ” या “मैं ही वह परम सत्य हूँ”. यह एक महावाक्य है जो यह बताता है कि हर व्यक्ति में असीमित शक्ति और चेतना का अंश है, जिसे ब्रह्म कहते हैं. यह वाक्य… Continue reading अहंब्रह्मास्मि” का अर्थ है “मैं ब्रह्म हूँ” या “मैं ही वह परम सत्य हूँ”